by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: आवारा कुत्तों को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में आवारा कुत्तों को स्थायी रूप से आश्रयों में स्थानांतरित करने के एक पुराने आदेश पर रोक लगा दी है। अब एक नए संशोधित आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने यह अनुमति दी है कि इन कुत्तों को नसबंदी (sterilization) के बाद वापस उन्हीं स्थानों पर छोड़ा जा सकता है, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था। हालांकि, सार्वजनिक स्थानों पर इन कुत्तों को खाना खिलाने पर प्रतिबंध रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विवरण:
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए, कुत्तों को पकड़कर उन्हें हमेशा के लिए शेल्टर होम में रखना कोई समाधान नहीं है। अदालत ने पशु कल्याण संगठनों और नागरिकों की दलीलों को सुना, जिसमें उन्होंने बताया कि कुत्तों को उनके प्राकृतिक आवास से हटाना उनके व्यवहार और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी ही सबसे प्रभावी तरीका है। इसलिए, अब दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में कुत्तों को पकड़कर उनकी नसबंदी की जाएगी और फिर उन्हें उनके ही क्षेत्र में वापस छोड़ दिया जाएगा। इस प्रक्रिया का उद्देश्य कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करना और रेबीज जैसे रोगों के प्रसार को रोकना है।
खाना खिलाने पर प्रतिबंध:
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाना लोगों के लिए असुविधा और सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है। अक्सर, खाने के लिए एकत्र होने वाले कुत्तों के कारण गलियों और पार्कों में लोगों को आवाजाही में दिक्कत होती है। इसलिए, अदालत ने सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने पर रोक लगाई है। यह आदेश उन लोगों के लिए एक झटका है जो नियमित रूप से आवारा कुत्तों को भोजन देते हैं।
प्रतिक्रियाएँ और आगे की राह:
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। पशु अधिकार कार्यकर्ता इस बात से खुश हैं कि कुत्तों को हमेशा के लिए आश्रयों में नहीं रखा जाएगा, लेकिन खाने पर प्रतिबंध को लेकर वे चिंतित हैं। दूसरी ओर, कई नागरिक समूहों ने इस फैसले का स्वागत किया है, उनका मानना है कि इससे गलियों में कुत्तों की वजह से होने वाली समस्याओं में कमी आएगी।
यह आदेश दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों के अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि स्थानीय प्रशासन इस आदेश को कैसे लागू करता है और क्या यह वास्तव में दोनों समस्याओं का समाधान कर पाता है।

