Spread the love

By: Ravindra Sikarwar

ग्वालियर: “स्मार्ट सिटी” का तमगा लगते ही ग्वालियरवासियों को लगा था कि अब शहर वाकई हाई-टेक हो जाएगा। रियल-टाइम ट्रैफिक अपडेट, प्रदूषण का लाइव आँकड़ा, मौसम की चेतावनी, आपातकालीन अलर्ट और स्वागत संदेश – ये सब कुछ बड़ी-बड़ी एलईडी स्क्रीन पर झिलमिलाता दिखेगा। लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी ये सपना सिर्फ सपना बनकर रह गया। शहर के प्रमुख चौकों-चौराहों पर 3.50 करोड़ रुपये की लागत से लगाए गए 10 वैरिएबल मैसेज डिस्प्ले (VMS) बोर्ड आज खामोश, काले और जंग खाए पड़े हैं। न कोई संदेश, न कोई अपडेट – बस खाली स्क्रीन पर धूल की मोटी परत और कभी-कभी टिमटिमाती हुई मरी हुई पिक्सल।

कहाँ-कहाँ लगे हैं ये ‘डेड’ बोर्ड?
स्मार्ट सिटी मिशन के तहत इन बोर्डों को शहर के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण स्थानों पर लगाया गया था ताकि अधिक से अधिक लोग लाभ उठा सकें। इनमें शामिल हैं:

  • डीडी मॉल के सामने
  • मराठा बोर्डिंग के पास
  • राजमाता विजयाराजे सिंधिया फ्लाईओवर चौराहा
  • गोले का मंदिर तिराहा
  • रेलवे स्टेशन के सामने (स्काउट गाइड ग्राउंड)
  • महाराज बाड़ा
  • ओल्ड सर्किट हाउस रोड
  • गश्त का ताजिया
  • उरवाई गेट
  • पाताली हनुमान मंदिर के पास

इन सभी जगहों पर दिन में भी ये बोर्ड बंद रहते हैं। रात में कभी-कभी हल्की चमक आती है, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ काला या नीला रंग ही दिखता है।

क्या-क्या दिखाना था, कुछ भी नहीं दिख रहा
इन बोर्डों का मूल उद्देश्य था:

  • लाइव ट्रैफिक अपडेट (कहाँ जाम है, वैकल्पिक रास्ता क्या है)
  • वायु प्रदूषण सूचकांक (AQI लेवल)
  • मौसम की ताजा जानकारी और चेतावनी
  • आपात स्थिति में तुरंत संदेश (बाढ़, भूकंप, अग्निकांड आदि)
  • शहर में आने वाले पर्यटकों के लिए स्वागत संदेश

लेकिन आज हालात यह हैं कि न तो प्रदूषण का स्तर पता चलता है, न जाम की जानकारी, न ही तापमान। कई बोर्ड तो पिछले दो-तीन साल से एकदम बंद पड़े हैं। कुछ पर तो पक्षियों ने घोंसले तक बना लिए हैं।

पैसे डूबे, जिम्मेदारी कोई नहीं
स्मार्ट सिटी डेवलपमेंट लिमिटेड कंपनी ने इन बोर्डों को लगाने के लिए करीब 35 लाख रुपये प्रति बोर्ड खर्च किए थे। कुल 3.50 करोड़ रुपये जनता की गाढ़ी कमाई के इस प्रोजेक्ट पर पानी फिर गया। ठेका मिला था एक निजी कंपनी को, जिसने इंस्टॉलेशन के बाद मेंटेनेंस का जिम्मा भी लिया था। लेकिन रखरखाव के नाम पर हर साल लाखों रुपये लेने के बाद भी कंपनी ने बोर्ड चालू रखने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले कुछ महीनों तक इन पर “ग्वालियर स्मार्ट सिटी” और “धन्यवाद” जैसे संदेश चलते थे। फिर धीरे-धीरे स्क्रीन फीकी पड़ने लगी और एक-एक कर सभी बोर्ड मर गए। शिकायतें की गईं, फोन किए गए, लेकिन जवाब मिला – “तकनीकी खराबी है, जल्द ठीक हो जाएगा”। यह “जल्द” अब सालों से चल रहा है।

जनता का गुस्सा, अधिकारी मौन
चौराहों पर खड़े लोगों का कहना है, “इतने पैसे तो एक स्कूल या अस्पताल बन जाता। यहाँ तो सिर्फ दिखावे के लिए बोर्ड लगा दिए और भूल गए।” एक ऑटो चालक ने तंज कसा, “साहब, स्मार्ट सिटी का मतलब यही है – स्मार्ट तरीके से पैसा डुबाना।”

नगर निगम और स्मार्ट सिटी कंपनी के अधिकारियों से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा कि “मेंटेनेंस का टेंडर दोबारा निकाला जा रहा है”। यानी अभी और इंतजार करना पड़ेगा।

ग्वालियर की जनता अब पूछ रही है – आखिर कब तक ये महंगे शो-पीस शहर की शोभा बढ़ाते रहेंगे? और कब इन 3.50 करोड़ रुपये का हिसाब होगा? स्मार्ट सिटी का सपना दिखाने वालों को अब जमीनी हकीकत भी दिखानी चाहिए, वरना ये काले पड़े बोर्ड आने वाले कई सालों तक प्रशासन की नाकामी की मिसाल बने रहेंगे।