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by-Ravindra Sikarwar

हाल ही में, ₹72,000 करोड़ की लागत वाली ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर देश में एक तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। सरकार इसे एक विकास परियोजना के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि पर्यावरणविद् और विपक्षी दल इस पर गंभीर पारिस्थितिक चिंताएँ उठा रहे हैं।

परियोजना का उद्देश्य और घटक:
यह परियोजना, जिसे नीति आयोग ने “भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण” बताया है, कई प्रमुख घटकों को कवर करती है:

  • ट्रांसशिपमेंट पोर्ट: एक बड़ा बंदरगाह जो दुनिया के प्रमुख शिपिंग मार्गों पर भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।
  • अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: एक नया हवाई अड्डा जो द्वीप पर कनेक्टिविटी बढ़ाएगा।
  • स्मार्ट सिटी: एक ग्रीनफील्ड शहर का निर्माण, जिसमें आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्र शामिल होंगे।
  • ऊर्जा संयंत्र: बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक सौर ऊर्जा संयंत्र।

सरकार का तर्क है कि यह परियोजना क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देगी, रोज़गार के अवसर पैदा करेगी और भारत की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करेगी।

पर्यावरणविदों की चिंताएँ:
आलोचकों का कहना है कि यह परियोजना अत्यधिक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। ग्रेट निकोबार द्वीप जैव विविधता का एक हॉटस्पॉट है और यहाँ कई दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

  • जैव विविधता का नुकसान: यह क्षेत्र निकोबारी मेगापोड (एक विशेष पक्षी), लेदरबैक समुद्री कछुए और नारियल केकड़े का घर है। परियोजना के निर्माण से इन प्रजातियों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाएँगे।
  • वनों की कटाई: परियोजना के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले पुराने और घने वनों को काटा जाएगा, जिससे कार्बन सिंक पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • आदिवासी समुदायों पर प्रभाव: यह द्वीप शोम्पेन और निकोबारी जैसे स्वदेशी समुदायों का घर भी है। आलोचकों का मानना है कि यह परियोजना इन समुदायों के जीवन और संस्कृति को बाधित कर सकती है।
  • समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा: बंदरगाह के निर्माण से आसपास के मैंग्रोव वन और प्रवाल भित्तियाँ (कोरल रीफ) खतरे में पड़ सकती हैं। ये समुद्री जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

सरकार का रुख और आगे की राह:
सरकार ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि परियोजना को पर्यावरण-अनुकूल तरीके से लागू किया जाएगा और सख्त निगरानी रखी जाएगी। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी।

इस परियोजना पर जारी बहस इस बात को दर्शाती है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। जहाँ सरकार इसे भारत के लिए एक गेम-चेंजर मानती है, वहीं पर्यावरणविद् और विशेषज्ञ इसे एक अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति के रूप में देख रहे हैं। इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, जहाँ इस परियोजना के खिलाफ याचिकाएं दायर की गई हैं।