by-Ravindra Sikarwar
इस्लामाबाद: पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समक्ष एक महत्वाकांक्षी योजना पेश की है, जिसमें अरब सागर तट पर एक नया नागरिक बंदरगाह बनाने का प्रस्ताव शामिल है। यह बंदरगाह बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर जिले के पास पसनी शहर में विकसित किया जाएगा, जो ईरान के चाबहार बंदरगाह से महज 300 किलोमीटर दूर स्थित है। यह कदम पाकिस्तान की अमेरिका के साथ संबंधों को पुनर्जीवित करने की कोशिश का हिस्सा है, जहां वाशिंगटन को व्यापारिक अवसरों के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का मौका दिया जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के सलाहकारों द्वारा अमेरिकी अधिकारियों को सौंपा गया है, जिसकी अनुमानित लागत 1.2 अरब डॉलर है।
प्रस्ताव की पृष्ठभूमि और उद्देश्य:
पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की दिशा में प्रयासरत रहा है, खासकर जब से डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभाला है। जो बाइडेन प्रशासन के दौरान पाकिस्तान को हाशिए पर धकेल दिया गया था, लेकिन ट्रंप के सत्ता में लौटने के बाद Islamabad ने व्हाइट हाउस के साथ निकटता बढ़ाई है। सितंबर 2025 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में एक गुप्त बैठक की, जहां खनन और ऊर्जा क्षेत्रों में अमेरिकी निवेश की बात हुई। इस बैठक के कुछ ही दिनों बाद यह बंदरगाह प्रस्ताव सामने आया।
पाकिस्तानी अधिकारियों का मानना है कि पसनी बंदरगाह अमेरिका को ईरान और मध्य एशिया के निकट व्यापारिक पहुंच प्रदान करेगा। योजना के ब्लूप्रिंट में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “पसनी की ईरान और मध्य एशिया से निकटता अमेरिका के व्यापार और सुरक्षा विकल्पों को मजबूत करेगी। यह ग्वादर को संतुलित करने और अरब सागर तथा मध्य एशिया में अमेरिकी प्रभाव को विस्तारित करने का अवसर देगा।” पाकिस्तान ने यह भी इशारा किया कि चीन द्वारा संचालित ग्वादर बंदरगाह (जो पसनी से मात्र 100 किलोमीटर दूर है) बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत ‘दोहरे उपयोग’ की चिंताओं को जन्म दे रहा है, जिसका अर्थ है कि यह सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है – एक आरोप जो इस्लामाबाद और बीजिंग दोनों ने खारिज किया है।
इस प्रस्ताव के पीछे पाकिस्तान की आर्थिक मजबूरियां भी हैं। बलूचिस्तान प्रांत में दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ मिनरल्स) के विशाल भंडार हैं, जिन्हें निर्यात करने के लिए एक मजबूत बंदरगाह की जरूरत है। अमेरिकी निवेशकों को टर्मिनल बनाने और संचालन का अधिकार देकर, पाकिस्तान इन संसाधनों तक वाशिंगटन की पहुंच सुनिश्चित करना चाहता है। पसनी शहर, जो अफगानिस्तान और ईरान की सीमा से सटा हुआ है, एक रणनीतिक स्थान पर है, जो क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा दे सकता है।
रणनीतिक महत्व और भारत की चिंताएं:
यह प्रस्ताव क्षेत्रीय भू-राजनीति को नई दिशा दे सकता है। ईरान का चाबहार बंदरगाह, जहां भारत शहीद बेहेश्ती टर्मिनल विकसित कर रहा है, पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। 2024 में भारत और ईरान ने इस बंदरगाह के विकास और प्रबंधन के लिए 10 वर्षीय समझौता किया था, जिससे नई दिल्ली को केंद्रीय एशियाई गलियारों का लाभ मिला। पसनी का स्थान चाबहार से इतना निकट होने के कारण, यह भारत की रणनीतिक परियोजना के लिए एक प्रतिद्वंद्वी बन सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाने के लिए चाबहार पर प्रतिबंध लगाए हैं, जो इस प्रस्ताव को और प्रासंगिक बनाता है। पाकिस्तान का इशारा है कि पसनी अमेरिका को ईरान पर वैकल्पिक प्रभाव स्थापित करने का मौका देगा। हालांकि, यदि अमेरिका इस योजना में शामिल होता है, तो पाकिस्तान को चीन के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि ग्वादर चीन का प्रमुख निवेश है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बीजिंग को असहज कर सकता है, खासकर जब से 2025 में चीनी राजदूत ने पाकिस्तानी नेतृत्व की आलोचना की थी कि वे चीनी इंजीनियरों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहे।
भारत इस विकास पर कड़ी नजर रख रहा है। नई दिल्ली के लिए चाबहार न केवल व्यापारिक मार्ग है, बल्कि पाकिस्तान-प्रभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक पहुंच का प्रतीक भी। यदि पसनी बंदरगाह विकसित होता है, तो यह भारत की क्षेत्रीय रणनीति को चुनौती दे सकता है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने अभी तक कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन स्रोतों के अनुसार, निगरानी बढ़ा दी गई है।
पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों का नया दौर:
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों में गर्मजोशी दिखाई दे रही है। ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम का श्रेय खुद को दिया था, जो अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में हुआ था। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शरीफ ने हाल की बैठक में अमेरिकी कंपनियों से खनन क्षेत्र में निवेश की अपील की थी, जबकि मुनीर ने ट्रंप को पाकिस्तान के खनिज संपदा की झलक दिखाई। यह बंदरगाह प्रस्ताव उसी निरंतरता का हिस्सा लगता है।
हालांकि, यह योजना अभी आधिकारिक सरकारी नीति नहीं है। यह मुनीर के सलाहकारों द्वारा तैयार की गई है और व्हाइट हाउस बैठक से पहले साझा की गई। अमेरिकी पक्ष की प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन यदि स्वीकार किया जाता है, तो यह दक्षिण एशिया की शक्ति संतुलन को बदल सकता है।
संभावित प्रभाव और चुनौतियां:
पसनी बंदरगाह के विकास से पाकिस्तान को आर्थिक लाभ मिल सकता है, जैसे रोजगार सृजन और निर्यात बढ़ावा। लेकिन बलूचिस्तान में विद्रोही गतिविधियां एक बड़ी चुनौती हैं, जहां स्थानीय अलगाववादी समूह विदेशी निवेशों का विरोध करते हैं। चीन के ग्वादर में भी इसी तरह की सुरक्षा समस्याएं रही हैं। यदि अमेरिका शामिल होता है, तो यह बलूचिस्तान में स्थिरता लाने में मदद कर सकता है, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय तनाव भी बढ़ा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव अमेरिका की ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के अनुरूप हो सकता है, जहां ईरान पर दबाव बनाते हुए वैकल्पिक मार्ग तलाशे जा रहे हैं। हालांकि, ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत निवेश की गारंटी नहीं है। पाकिस्तान को अब यह देखना है कि क्या वाशिंगटन इस अवसर को हाथों-हाथ लेगा।
निष्कर्ष:
पाकिस्तान का यह बंदरगाह प्रस्ताव अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने की एक साहसिक कोशिश है, जो क्षेत्रीय गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है। चाबहार के निकट पसनी का स्थान इसे भारत और ईरान के लिए चिंता का विषय बनाता है, जबकि चीन के लिए एक संकेत। ट्रंप प्रशासन की प्रतिक्रिया से ही इसकी दिशा स्पष्ट होगी। अधिक जानकारी के लिए फाइनेंशियल टाइम्स या पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
