By: Yogendra Singh
Morena : जिले से पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर उत्साहजनक खबर सामने आई है। चंबल क्षेत्र में गिद्धों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे वन विभाग और पर्यावरण प्रेमियों में खुशी का माहौल है। हाल ही में आयोजित शीतकालीन गणना अभियान के आंकड़ों के अनुसार जिले में गिद्धों की कुल संख्या 370 से अधिक पहुंच गई है। यह वृद्धि दर्शाती है कि संरक्षण के प्रयास रंग ला रहे हैं और पारिस्थितिकी तंत्र धीरे-धीरे संतुलन की ओर लौट रहा है।

तीन दिवसीय विशेष गणना अभियान: व्यापक स्तर पर हुई निगरानी
Morena वन विभाग द्वारा 20 से 22 फरवरी तक तीन दिनों का विशेष सर्वे अभियान चलाया गया। इस दौरान जिले की सभी 61 वन बीटों और चंबल नदी के 44 प्रमुख घाटों पर गिद्धों की मौजूदगी का आंकलन किया गया। अधिकारियों और वनकर्मियों ने सुबह से शाम तक विभिन्न स्थानों पर पहुंचकर प्रत्यक्ष अवलोकन किया।
पहले दिन 131 गिद्धों की पहचान की गई, दूसरे दिन 115 गिद्ध दर्ज किए गए, जबकि तीसरे दिन 124 गिद्धों की गणना हुई। तीनों दिनों के समेकित आंकड़ों के आधार पर जिले में कुल 370 गिद्ध पाए गए। इनमें सबसे अधिक 129 गिद्ध पहाड़गढ़ रेंज में दर्ज किए गए, जो जिले में गिद्धों का प्रमुख आवास क्षेत्र बनकर उभरा है। यह परिणाम दर्शाते हैं कि चंबल का प्राकृतिक वातावरण इन पक्षियों के लिए अनुकूल बन रहा है।
विलुप्ति के संकट से उबरती प्रजाति
Morena एक समय था जब 1990 के दशक से लेकर 2007 तक गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। चंबल सहित पूरे मध्य प्रदेश में इनकी आबादी लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गई थी। जहरीली पशु-चिकित्सा दवाओं और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण इनकी संख्या में लगभग 99 प्रतिशत तक कमी आई थी। इसके चलते गिद्धों को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया।
हालांकि, बीते वर्षों में संरक्षण के लिए सख्त कदम उठाए गए। हानिकारक दवाओं पर रोक, सुरक्षित प्रजनन स्थलों की पहचान और नियमित मॉनिटरिंग जैसे प्रयासों से हालात में सुधार आया है। राज्य स्तर पर हुई हालिया गणना में मध्य प्रदेश में गिद्धों की संख्या 12 हजार से अधिक दर्ज की गई है, जो प्रदेश को गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी बनाती है।
पर्यावरण के स्वच्छता प्रहरी: क्यों जरूरी हैं गिद्ध?
Morena गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है। ये मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके कारण संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया और बीमारियों का खतरा कम होता है। यदि गिद्धों की संख्या घटती है तो सड़ते शवों के कारण अन्य जानवरों और इंसानों में रोग फैलने की आशंका बढ़ जाती है।
मुरैना और चंबल क्षेत्र में गिद्धों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि यहां की खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिक तंत्र पुनः संतुलित हो रहे हैं। वन विभाग की सतत निगरानी, स्थानीय समुदाय की सहभागिता और जागरूकता अभियानों ने इस सफलता में अहम भूमिका निभाई है। आने वाले समय में यदि यही प्रयास जारी रहे, तो यह क्षेत्र देश में गिद्ध संरक्षण का मॉडल बन सकता है।
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