Mohan YadavMohan Yadav
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Mohan Yadav: मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का जीवन केवल राजनीति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, अनुशासन, पारिवारिक त्याग और आत्मसंयम का जीवंत उदाहरण भी है। स्वदेश स्टूडियो के उद्घाटन अवसर पर उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई ऐसे प्रसंग साझा किए, जो उन्हें एक संवेदनशील और जमीन से जुड़े नेता के रूप में सामने लाते हैं।

Mohan Yadav: पिता की सीख और आत्मनिर्भरता की शुरुआत

डॉ. मोहन यादव बताते हैं कि उनके पिता चाहते थे कि पढ़ाई के साथ-साथ कोई अपना काम जरूर होना चाहिए। इसी सोच के चलते उन्होंने कॉलेज के पहले वर्ष से ही चाय-पोहे की दुकान शुरू की। वर्ष 1982 में खोली गई यह छोटी सी होटल तीन साल तक चली। इसके बाद समय की कमी को देखते हुए उन्होंने खाने का होटल खोला, ताकि पढ़ाई और संगठन के कार्यों के बीच संतुलन बना रहे। आगे चलकर उन्होंने निजी मकान बनाकर बेचने का काम भी किया। उनका कहना है कि पिता की वजह से वे हमेशा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहे और किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत नहीं आई।

Mohan Yadav: राजनीति और अध्यात्म के बीच संतुलन

1980 के दशक में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। परिवार को चिंता थी कि भविष्य क्या होगा। एक ज्योतिषीय चर्चा में यह बात सामने आई कि उनके जीवन में राजनीति या अध्यात्म—दो स्पष्ट रास्ते हैं। डॉ. यादव मानते हैं कि उन्होंने अपने विवेक से राजनीति का मार्ग चुना, लेकिन अध्यात्म उनके जीवन में हमेशा समानांतर रूप से मौजूद रहा।

Mohan Yadav: परिवार का त्याग और भावनात्मक क्षण

मुख्यमंत्री बनने से पहले और बाद में भी उनका जीवन अत्यंत व्यस्त रहा। वे स्वीकार करते हैं कि संगठन और सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता के कारण उन्हें यह तक पता नहीं चला कि उनकी बेटी कब बैठना और चलना सीख गई। परिवार ने इस त्याग को कभी बोझ नहीं माना। उन्होंने अपने बच्चों को सख्त हिदायत दी कि वे कभी यह न बताएं कि उनके पिता मुख्यमंत्री हैं।

सादगी की मिसाल: विवाह और निजी जीवन

डॉ. मोहन यादव ने अपने बच्चों के विवाह में भी सादगी का उदाहरण पेश किया। एक बेटे का विवाह सामूहिक विवाह सम्मेलन में कराया गया, जहां वे स्वयं 22वें जोड़े का हिस्सा बने। उन्होंने अपने मुख्यमंत्री मित्रों तक से आग्रह किया कि वे समारोह में न आएं, ताकि कोई दिखावा न हो। उनका मानना है कि सार्वजनिक जीवन में रहते हुए निजी जीवन में सादगी और अनुशासन ही सबसे बड़ी पूंजी है।

डॉ. मोहन यादव की यह जीवनयात्रा बताती है कि सत्ता से पहले संस्कार और पद से पहले कर्तव्य उनके लिए हमेशा प्राथमिक रहे हैं।

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