Spread the love

By: Ravindra Sikarwar

जबलपुर: मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में लागू ‘हमारे शिक्षक ई’ ऐप को लेकर शिक्षक समुदाय में भारी रोष है। शुक्रवार को जबलपुर हाईकोर्ट की एकल पीठ (न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल) ने 27 शिक्षकों की ओर से दायर याचिका पर विस्तृत सुनवाई की। शिक्षकों ने संशोधन आवेदन दाखिल कर गंभीर आरोप लगाए हैं कि यह ऐप न केवल तकनीकी रूप से कमज़ोर है, बल्कि इसके ज़रिए बड़े स्तर पर डेटा चोरी, फर्जी अटेंडेंस और साइबर धोखाधड़ी की घटनाएं हो रही हैं। कोर्ट ने इन आरोपों को बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से दो कार्यदिवस के अंदर विस्तृत जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है।

याचिकाकर्ता शिक्षकों का कहना है कि स्कूल शिक्षा विभाग ने बिना किसी पुख्ता सुरक्षा ऑडिट के ‘हमारे शिक्षक ई’ ऐप को अनिवार्य कर दिया। ऐप में जियो-फेंसिंग और फेशियल रिकग्निशन की व्यवस्था है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या के कारण शिक्षक बार-बार फेल हो रहे हैं। सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह किया गया कि कई शिक्षकों के मोबाइल से उनकी जानकारी और फोटो के बिना उनकी अटेंडेंस मार्क हो जा रही है। कुछ मामलों में तो शिक्षक छुट्टी पर या बीमार होने के बावजूद ऐप में हाज़िर दिखाए जा रहे हैं।

याचिका में संलग्न दस्तावेज़ों के अनुसार:

  • कई शिक्षकों के आधार नंबर और बैंक खातों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी लीक हो चुकी है।
  • कुछ शिक्षकों को फर्जी लोन मैसेज और OTP चोरी के मामले सामने आए हैं।
  • एक शिक्षक ने सबूत दिया कि वह विदिशा जिले में था, लेकिन ऐप ने उसे भोपाल के एक स्कूल में हाज़िर दिखा दिया।
  • कुछ जगहों पर तो एक ही मोबाइल से दर्जनों शिक्षकों की अटेंडेंस मार्क की जा रही है, जिससे संदेह है कि प्राइवेट एजेंसियां या कुछ कर्मचारी मिलकर फर्जीवाड़ा कर रहे हैं।

शिक्षकों के अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि ऐप को बनाने वाली कंपनी का कोई प्रमाणित साइबर सिक्योरिटी सर्टिफिकेट नहीं है। न तो NIC और न ही कोई मान्यता प्राप्त एजेंसी ने इसकी सुरक्षा जाँच की है। शिक्षकों को बायोमेट्रिक डेटा देने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो निजता के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही, ऐप फेल होने पर शिक्षकों का वेतन काटा जा रहा है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।

कोर्ट ने शिक्षकों के संशोधन आवेदन को स्वीकार करते हुए कहा कि ये आरोप अत्यंत गंभीर हैं। अगर साइबर फ्रॉड और डेटा लीक की घटनाएं सच हैं तो यह न केवल शिक्षकों के मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि राज्य की लाखों लोगों की निजी जानकारी भी खतरे में है। न्यायमूर्ति ने टिप्पणी की, “सरकार करोड़ों रुपए खर्च करके ऐप बना रही है, लेकिन अगर वही ऐप शिक्षकों को परेशान और असुरक्षित कर रहा है तो इसका औचित्य क्या है?”

अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव, आयुक्त लोक शिक्षण और ऐप बनाने वाली कंपनी को पक्षकार बनाते हुए दो दिन के अंदर निम्नलिखित बिंदुओं पर जवाब मांगा है:

  1. ऐप की साइबर सिक्योरिटी ऑडिट रिपोर्ट।
  2. पिछले छह महीनों में दर्ज हुई डेटा लीक या फर्जी अटेंडेंस की शिकायतों का विवरण।
  3. जियो-फेंसिंग और फेशियल रिकग्निशन की तकनीकी खामियों का ब्यौरा।
  4. क्या शिक्षकों को ऐप फेल होने पर वेतन काटने का अधिकार है?

मामले की अगली सुनवाई अब 2 दिसंबर को होगी। शिक्षक संगठनों ने इस सुनवाई को ऐतिहासिक बताया है। मध्य प्रदेश शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा, “लगभग ढाई लाख शिक्षक इस ऐप की मार झेल रहे हैं। कई शिक्षिकाएं सुबह 6 बजे से जंगल-पहाड़ में नेटवर्क ढूंढती फिरती हैं। हाईकोर्ट ने अगर राहत दी तो यह पूरे शिक्षक समाज की जीत होगी।”

वहीं सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि विभाग के आला अधिकारी आपात बैठक कर रहे हैं। कुछ अधिकारी मान रहे हैं कि ऐप में तकनीकी खामियां हैं और इसे ठीक करने के लिए नई कंपनी को ज़िम्मेदारी दी जा सकती है।

शिक्षक समुदाय को उम्मीद है कि हाईकोर्ट इस मामले में कोई ठोस अंतरिम राहत देगा, जिसमें कम से कम वेतन कटौती पर रोक और ऐप को वैकल्पिक बनाने का आदेश शामिल हो सकता है।