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Report by: Ravindra Singh

Bhopal : देश में ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ की अवधारणा को साकार करने की दिशा में मध्यप्रदेश अब एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। उत्तराखंड और हाल ही में गुजरात द्वारा विधानसभा में यूसीसी (UCC) विधेयक पारित किए जाने के बाद, अब मध्यप्रदेश सरकार ने भी राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने की कवायद तेज कर दी है। सूत्रों के अनुसार, राज्य में इसके लिए ड्राफ्टिंग कमेटी और विशेषज्ञों की राय लेने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।

Bhopal भाजपा का ‘कोर एजेंडा’: वैचारिक प्रतिबद्धता से प्रशासनिक क्रियान्वयन तक

राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद, समान नागरिक संहिता (UCC) भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख वैचारिक संकल्पों में से एक रहा है। पार्टी इसे केवल एक कानून के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और लैंगिक न्याय के एक बड़े माध्यम के रूप में देख रही है।

  • रणनीति: मध्यप्रदेश में आगामी मानसून सत्र या उसके बाद के सत्र में इस विधेयक को पेश किए जाने की प्रबल संभावना है।
  • उद्देश्य: मुख्यमंत्री और राज्य कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्रियों ने संकेत दिए हैं कि इसका मुख्य लक्ष्य महिलाओं को सशक्त बनाना और दशकों पुराने धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों में व्याप्त विसंगतियों को दूर करना है।

Bhopal आखिर क्या है UCC? सरल शब्दों में समझिए

यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का सीधा अर्थ है—एक ऐसा कानून जो भारत के हर नागरिक पर समान रूप से लागू हो, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या पंथ का क्यों न हो।

  • कार्यक्षेत्र: यह कानून मुख्य रूप से विवाह (मैरिज), तलाक (डिवोर्स), उत्तराधिकार (इनहेरिटेंस), गोद लेना (एडॉप्शन) और संपत्ति के बँटवारे जैसे नागरिक मामलों को कवर करता है।
  • संवैधानिक आधार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) स्पष्ट रूप से कहता है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।

उत्तराखंड और गुजरात मॉडल का अध्ययन

मध्यप्रदेश सरकार इस कानून को तैयार करने के लिए अन्य भाजपा शासित राज्यों के मॉडलों का गहन अध्ययन कर रही है।

  • उत्तराखंड: यहाँ 2024-25 में इसे लागू किया गया, जिसमें लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण जैसा क्रांतिकारी प्रावधान शामिल है।
  • गुजरात: मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा ने इसे बहुमत से पारित किया, जिसने मध्यप्रदेश के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।
  • गोवा मॉडल: गौरतलब है कि गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य रहा है जहाँ पुर्तगाली शासन के समय से ही (1961 के बाद भी) एक समान कानून लागू है।

विरोध के स्वर और भविष्य की चुनौतियाँ

जहाँ सरकार इसे आधुनिक सुधार बता रही है, वहीं धार्मिक संगठनों और विपक्षी दलों ने इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) का तर्क है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान पर प्रहार है।

  • कानूनी पेच: आलोचकों का कहना है कि भारत जैसी विविधतापूर्ण संस्कृति वाले देश में व्यक्तिगत कानूनों को पूरी तरह खत्म करना संवैधानिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • निष्कर्ष: विरोध के बावजूद, मध्यप्रदेश में जिस तरह से प्रशासनिक तैयारी चल रही है, उससे साफ है कि राज्य सरकार इसे लागू करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। आने वाले महीनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति और सामाजिक चर्चा के केंद्र में रहने वाला है।

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