By: Ravindra Sikarwar
भागीरथपुरा त्रासदी: इंदौर का सामूहिक दर्द
किसी दुर्घटना या लापरवाही से एक व्यक्ति की मौत भी असहनीय होती है। यह पीड़ा केवल वही परिवार महसूस कर सकता है, जिसने अपने प्रियजन को खोया हो। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों ने पूरे क्षेत्र को गहरा सदमा दिया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 18 लोगों की जान गई, जबकि अनौपचारिक रिपोर्ट्स में यह संख्या 20 तक बताई जा रही है। यह शोक सिर्फ एक मोहल्ले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे इंदौर शहर, प्रदेश और यहां तक कि देश-विदेश से आने वाली संवेदनाओं में दिख रहा है। लोग आक्रोश और शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं, साथ ही इस घटना से सबक लेने और जिम्मेदारों को सजा देने की मांग कर रहे हैं।
सरकार की त्वरित कार्रवाई
इस हादसे के सामने आते ही राज्य सरकार, प्रशासन और नगर निगम ने सक्रिय भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद 31 दिसंबर को इंदौर पहुंचे, पीड़ित परिवारों से मिले और लापरवाही को स्वीकार करते हुए तुरंत प्रशासनिक कदम उठाए। अधिकारियों के निलंबन से लेकर मुआवजे की घोषणा तक, सरकार ने शुरुआत से ही राहत कार्यों पर जोर दिया।
दिग्विजय सिंह की चुप्पी पर सवाल
इसी बीच, पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की 10-11 दिनों की खामोशी चर्चा का विषय बनी हुई है। आमतौर पर छोटे-मोटे मुद्दों पर भी तुरंत प्रतिक्रिया देने वाले दिग्विजय सिंह इस गंभीर त्रासदी पर लंबे समय तक मौन रहे। 8 जनवरी को उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर न्यायिक जांच की मांग की, मुआवजे की सीमाओं पर सवाल उठाए और दोषियों को सजा देने की बात कही। उन्होंने लिखा कि ट्रांसफर और मुआवजे से शहर पर लगा कलंक नहीं मिटता, हाईकोर्ट के बैठे जज से सार्वजनिक सुनवाई वाली जांच होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी घटना पर ‘राजाजी’ को इतनी देरी क्यों हुई? क्या राजनीतिक गणित ने उनकी संवेदना को प्रभावित किया?
कांग्रेस में भी असंतोष
कांग्रेस पार्टी के अंदर भी इस देरी पर बेचैनी दिखी। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने खुले तौर पर कहा कि दिग्विजय सिंह को पहले ही सक्रिय होना चाहिए था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मौके पर पहुंचकर मोर्चा संभाला, इलाके में जाकर पानी के सैंपल इकट्ठे किए और पीड़ितों से मुलाकात की। दिग्विजय सिंह की पोस्ट आने के बाद लगता है कि यह अपनी ही पार्टी के नेताओं की सक्रियता का जवाब थी।
निष्कर्ष: संदेह से भरी सक्रियता
भागीरथपुरा हादसे में दिग्विजय सिंह की 11वें दिन की प्रतिक्रिया ने संवेदना से ज्यादा शंकाएं पैदा की हैं। मुख्य सवाल यह नहीं कि उन्होंने क्या कहा, बल्कि यह कि वे इतने दिनों तक कहां थे। कुछ लोग तो यहां तक पूछ रहे हैं कि क्या इलाके में मुस्लिम समुदाय के न होने से उनकी प्रतिक्रिया देर से आई? अगर ऐसा हादसा किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में होता, तो शायद उनकी प्रतिक्रिया अलग होती। यही वजह है कि उनकी यह ‘मातमपुर्सी’ राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गई है।
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