Lab Grown GoldLab Grown Gold
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Lab Grown Gold : सोना सदियों से धन, प्रतिष्ठा और निवेश का प्रतीक रहा है। परंपरागत रूप से सोना खदानों से निकाला जाता है, लेकिन विज्ञान की प्रगति ने अब प्रयोगशाला में सोना तैयार करने की दिशा में भी संभावनाएं खोल दी हैं। इसी को “लैब-ग्रोवन गोल्ड” या कृत्रिम रूप से निर्मित सोना कहा जाता है। आइए समझते हैं कि यह क्या है और इसे कैसे बनाया जाता है।

लैब-ग्रोन गोल्ड क्या होता है?

Lab Grown Gold से आशय उस सोने से है जिसे प्राकृतिक खनन के बजाय नियंत्रित वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से सोना एक रासायनिक तत्व (Au) है, जिसका परमाणु क्रमांक 79 है।
प्राकृतिक सोना पृथ्वी की परतों में लाखों-करोड़ों वर्षों में भूगर्भीय प्रक्रियाओं से बनता है। वहीं लैब में इसे या तो रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिए अलग किया जाता है या फिर उन्नत परमाणु तकनीक से अन्य तत्वों को परिवर्तित कर सोने के रूप में तैयार किया जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया बेहद जटिल और महंगी होती है।

लैब में सोना कैसे बनाया जाता है?

Lab Grown Gold कृत्रिम सोना बनाने के दो प्रमुख वैज्ञानिक तरीके माने जाते हैं:

  1. न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन (परमाणु परिवर्तन): इस प्रक्रिया में किसी अन्य धातु, जैसे पारा (Mercury) या प्लेटिनम (Platinum) के परमाणु संरचना में बदलाव कर उसे सोने में परिवर्तित करने की कोशिश की जाती है। यह कार्य न्यूक्लियर रिएक्टर या कण त्वरक (Particle Accelerator) की सहायता से किया जाता है।
    हालांकि तकनीकी रूप से यह संभव है, लेकिन इसकी लागत इतनी अधिक होती है कि व्यावसायिक रूप से यह लाभकारी नहीं है।
  2. ई-वेस्ट और खनिज अपशिष्ट से शुद्धिकरण: आधुनिक तकनीक के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक कचरे (जैसे पुराने मोबाइल, कंप्यूटर चिप्स) और खनिज अपशिष्ट से सोने के अंश निकालकर उन्हें रासायनिक प्रक्रियाओं से शुद्ध किया जाता है। इसे भी कई बार लैब-प्रोसेस्ड गोल्ड कहा जाता है, क्योंकि इसमें खनन की बजाय नियंत्रित वैज्ञानिक प्रक्रिया का उपयोग होता है।

क्या लैब-ग्रोन गोल्ड भविष्य है?

Lab Grown Gold विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर परमाणु प्रक्रिया से सोना बनाना फिलहाल आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है। लेकिन ई-वेस्ट से सोना निकालने की तकनीक पर्यावरण के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। इससे खनन पर निर्भरता कम हो सकती है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण संभव है।

हालांकि बाजार में “लैब-ग्रोवन गोल्ड” शब्द का इस्तेमाल कभी-कभी मार्केटिंग के लिए भी किया जाता है, इसलिए निवेश या खरीदारी से पहले प्रमाणिकता की जांच जरूरी है।

कुल मिलाकर, लैब में सोना बनाना वैज्ञानिक रूप से संभव जरूर है, लेकिन फिलहाल पारंपरिक खनन की तुलना में यह महंगा और सीमित स्तर पर ही व्यावहारिक है।

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