By: Ishu Kumar
Kalyan : महाराष्ट्र के कल्याण से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने न केवल समाज को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि आवारा कुत्तों की समस्या और रेबीज के प्रति लापरवाही के गंभीर परिणामों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ के एक निजी बैंक में वरिष्ठ पद पर कार्यरत युवक, ऐस विश्वनाथ अमीन, ने कुत्ते के काटने के बाद उपजे रेबीज के डर से मौत को गले लगा लिया। अमीन कल्याण ईस्ट के तिसगांव नाका स्थित सहजीवन सोसायटी में रहते थे। यह मामला दर्शाता है कि कैसे अधूरी जानकारी और जानलेवा बीमारी का भय किसी व्यक्ति को आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर सकता है।
इलाज में चूक और मानसिक तनाव: मौत का कारण
Kalyan रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ समय पहले ऐस अमीन को एक आवारा कुत्ते ने अपना शिकार बनाया था। शुरुआती तौर पर उन्होंने चिकित्सा सहायता ली और रेबीज के शुरुआती इंजेक्शन भी लगवाए थे। हालाँकि, बीच में ही उन्होंने अपना इलाज और दवाइयों का कोर्स अधूरा छोड़ दिया। चिकित्सकों का कहना है कि रेबीज जैसी बीमारी में टीकाकरण का पूरा कोर्स अनिवार्य होता है।
अधूरे इलाज के कारण अमीन के शरीर में रेबीज के शुरुआती लक्षण दिखने लगे थे। रेबीज के लक्षणों का उभरना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक रूप से भयावह हो सकता है, क्योंकि इसका कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है। बताया जा रहा है कि अमीन अपने परिवार को इस असहनीय पीड़ा और बीमारी के वीभत्स रूप को देखने से बचाना चाहते थे। इसी डर और डिप्रेशन के चलते उन्होंने अपने घर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
रेबीज की घातकता: लक्षण दिखने के बाद बचने की उम्मीद शून्य
Kalyan चिकित्सा जगत में रेबीज को ‘लाइलाज’ माना जाता है यदि एक बार इसके लक्षण विकसित हो जाएं। यह वायरस सीधे व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) पर हमला करता है।
- 100% मृत्यु दर: एक बार लक्षण दिखने के बाद यह बीमारी लगभग शत-प्रतिशत जानलेवा होती है।
- मस्तिष्क पर प्रभाव: यह वायरस नसों के जरिए मस्तिष्क तक पहुँचता है, जिससे वहां सूजन आ जाती है और व्यक्ति का अपने व्यवहार व सांस लेने की प्रक्रिया पर नियंत्रण नहीं रहता।
- हाइड्रोफोबिया: पीड़ित को पानी और हवा से डर लगने लगता है, जो अत्यंत कष्टदायक स्थिति होती है।
- अदृश्य खतरा: रेबीज का वायरस शरीर में हफ्तों या महीनों तक निष्क्रिय रह सकता है। लोग अक्सर इसे गंभीरता से नहीं लेते, लेकिन जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक वायरस शरीर पर पूरी तरह कब्जा कर चुका होता है।
प्रशासन की विफलता और स्थानीय नागरिकों का आक्रोश
Kalyan इस दुखद आत्महत्या के बाद कल्याण क्षेत्र में भारी जनाक्रोश देखा जा रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि नगर निगम आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने में विफल रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए शिवसेना (शिंदे गुट) के पार्षद महेश गायकवाड़ ने नगर निगम के एडिशनल कमिश्नर हर्षल गायकवाड़ से मुलाकात की।
उन्होंने मांग की है कि:
- शहर में आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण अभियान तेज किया जाए।
- खतरनाक कुत्तों को आवासीय क्षेत्रों से हटाया जाए।
- जनता के बीच रेबीज के टीकाकरण के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जाए ताकि कोई भी बीच में इलाज न छोड़े।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि आवारा कुत्तों की समस्या केवल नगर निगम का प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर विषय है।
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