
नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में न्यायमूर्ति कैलाश नाथ वांचू एक अद्वितीय व्यक्तित्व हैं। उन्होंने बिना कानून की औपचारिक डिग्री हासिल किए भारत के 10वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) का पद संभाला। हाल ही में, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वांचू के जीवन और करियर का उल्लेख करते हुए एक विवाद को जन्म दिया है। इस विवाद ने वांचू के असाधारण जीवन और उनकी नियुक्ति के आसपास की परिस्थितियों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
कैलाश नाथ वांचू: मध्य प्रदेश की माटी से सर्वोच्च न्यायालय तक
25 फरवरी, 1903 को मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे कैलाश नाथ वांचू का न्यायपालिका से गहरा नाता है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नौगांव (मध्य प्रदेश) और कानपुर के पंडित पीरथी नाथ हाई स्कूल में हुई। इसके बाद, उन्होंने इलाहाबाद के म्योर सेंट्रल कॉलेज और ऑक्सफोर्ड के वाधम कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। यह उल्लेखनीय है कि उनकी डिग्री कानून में नहीं थी।
1924 में, वांचू ने भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) की कठिन परीक्षा उत्तीर्ण की और दो साल के प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन गए। इस प्रशिक्षण के दौरान, उन्होंने आपराधिक कानून की बुनियादी जानकारी प्राप्त की, जो उनकी कानूनी समझ का आधार बनी। 1926 में भारत लौटने पर, उन्हें संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) में सहायक मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के रूप में नियुक्त किया गया।
प्रशासक से मुख्य न्यायाधीश तक का अप्रत्याशित सफर
वांचू का करियर तेजी से आगे बढ़ा। 1937 तक वे संयुक्त प्रांत में सत्र और जिला न्यायाधीश बन गए थे। 1947 में, उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया, शुरू में एक अस्थायी भूमिका में, लेकिन दस महीनों के भीतर उनकी स्थायी नियुक्ति हो गई। 1951 में, वे राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने और 1958 में उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ 1967 में आया। तत्कालीन CJI के. सुब्बा राव ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए अचानक इस्तीफा दे दिया। इस अप्रत्याशित स्थिति में, 24 अप्रैल, 1967 को वांचू को भारत का 10वां मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उन्होंने इस पद पर 10 महीने तक कार्य किया और 24 फरवरी, 1968 को सेवानिवृत्त हुए। अपने कार्यकाल में, उन्होंने 355 फैसले लिखे और 1,286 बेंचों का हिस्सा रहे।
वांचू ने संवैधानिक, श्रम और संपत्ति कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में अपनी कानूनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। उदाहरण के लिए, I.C. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) मामले में, उन्होंने संसद की संविधान संशोधन की शक्ति पर बहुमत के विपरीत असहमति जताई, जो बाद में केशवानंद भारती मामले में एक
बिना लॉ डिग्री के CJI: एक असाधारण परिस्थिति
आज के दौर में, बिना कानून की डिग्री के किसी व्यक्ति का सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, खासकर मुख्य न्यायाधीश बनना अकल्पनीय है। हालांकि, उस समय का भारत अलग था। स्वतंत्रता के बाद, देश में कानूनी ढांचा अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ था। आईसीएस अधिकारियों को उनकी प्रशासनिक क्षमता और बौद्धिक कौशल के आधार पर न्यायिक भूमिकाएँ सौंपी जाती थीं। वांचू की नियुक्ति को उनकी असाधारण योग्यता और अनुभव का परिणाम माना जाता है, जबकि कुछ लोग इसे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का प्रभाव मानते हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कुछ पोस्ट में यह दावा किया गया है कि वांचू को तत्कालीन प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के साथ करीबी संबंधों के कारण यह पद मिला। हालांकि, इन दावों का कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी, यह निर्विवाद सत्य है कि उनकी नियुक्ति उस दौर की असाधारण परिस्थितियों का परिणाम थी।
निशिकांत दुबे का बयान और ताजा विवाद
ताजा विवाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के ‘एक्स’ पर किए गए एक पोस्ट से शुरू हुआ। दुबे ने कैलाशनाथ वांचू की कहानी का उल्लेख करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च न्यायालय और वर्तमान CJI संजीव खन्ना पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय को ही कानून बनाना है, तो संसद को बंद कर देना चाहिए। वांचू का उदाहरण देते हुए उन्होंने कटाक्ष किया कि जब बिना लॉ डिग्री के कोई CJI बन सकता है, तो आज की न्यायपालिका इतना ‘हस्तक्षेप’ क्यों कर रही है?
दुबे का यह बयान वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 की सुनवाई के संदर्भ में आया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए और सरकार को उन्हें लागू करने से रोकने का निर्देश दिया।
कांग्रेस, एआईएमआईएम और आप जैसे विपक्षी दलों ने दुबे के बयान को सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा पर हमला बताया है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने इसे “अपमानजनक” करार दिया, जबकि आप नेता प्रियंका कक्कड़ ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग की है। हालांकि, भाजपा ने आधिकारिक तौर पर दुबे के बयान से खुद को अलग कर लिया है। पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने स्पष्ट किया कि यह दुबे का व्यक्तिगत विचार है और पार्टी इसका समर्थन नहीं करती।
इस विवाद ने न्यायमूर्ति कैलाश नाथ वांचू के अद्वितीय करियर और उनकी CJI के रूप में अप्रत्याशित नियुक्ति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यह घटना भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू है, जो उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है।
