By: Ishu Kumar
Jabalpur : मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले से जैव-विविधता के क्षेत्र में एक उत्साहजनक और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। नर्मदा नदी और उसके आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों में किए गए विस्तृत सर्वेक्षण के दौरान तितलियों की चार ऐसी प्रजातियां पाई गई हैं, जिन्हें अब तक प्रदेश में कभी दर्ज नहीं किया गया था। यह खोज न केवल जबलपुर बल्कि पूरे मध्यप्रदेश के लिए गौरव का विषय है, क्योंकि इससे राज्य की समृद्ध और जीवंत जैव-विविधता की पुष्टि होती है।
Jabalpur प्रदेश में पहली बार दर्ज हुईं चार दुर्लभ तितलियां
शोध के दौरान जिन चार तितलियों को मध्यप्रदेश में पहली बार रिकॉर्ड किया गया है, उनमें निम्फैलिडी कुल की नेप्टिस सैफो और टैनैसिया लेपिडिया शामिल हैं। वहीं रियोडिनिडी कुल की डोडोना डिपोआ और जेमेरोस फ्लेग्यास भी इस सूची का हिस्सा हैं। इन सभी प्रजातियों की उपस्थिति बरगी डैम के कैचमेंट एरिया में दर्ज की गई है। इससे यह क्षेत्र तितलियों की विविधता के लिहाज से एक संभावनाशील बटरफ्लाई हॉट-स्पॉट के रूप में उभरकर सामने आया है।
Jabalpur अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हुई पहचान
इस शोध में कुछ तितलियों की पहचान संग्रहित नमूनों के माध्यम से की गई, जबकि कुछ प्रजातियों की पुष्टि वैज्ञानिक फोटोग्राफी के आधार पर हुई। सभी रिकॉर्ड अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मानकों के अनुसार सत्यापित किए गए हैं। इस महत्वपूर्ण शोध कार्य को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल एंटोमोलॉजी रिसर्च जर्नल में प्रकाशित किया गया है, जो वेब ऑफ साइंस से संबद्ध है। इससे इस खोज की विश्वसनीयता और वैज्ञानिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
पर्यावरण की सेहत का मजबूत संकेत
यह उल्लेखनीय शोध डॉ. श्रद्धा खापरे और डॉ. अर्जुन शुक्ला द्वारा किया गया है, जो पिछले दो वर्षों से इस क्षेत्र में तितलियों पर अध्ययन कर रहे थे। शोध के दौरान अलग-अलग तिथियों में इन तितलियों को रिकॉर्ड किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र लंबे समय से इन संवेदनशील प्रजातियों के लिए अनुकूल बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार तितलियां पर्यावरण की स्थिति बताने वाली महत्वपूर्ण जैव-सूचक होती हैं। उनकी मौजूदगी यह दर्शाती है कि किसी क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित और स्वस्थ है।
डॉ. श्रद्धा खापरे का कहना है कि तितलियां परागण में अहम भूमिका निभाती हैं, जिससे वनस्पतियों का प्राकृतिक चक्र बना रहता है। वहीं डॉ. अर्जुन शुक्ला के अनुसार यह खोज केवल एक नया वैज्ञानिक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि नर्मदा अंचल की जीवंत और संरक्षित प्रकृति का प्रमाण है। यह उपलब्धि बताती है कि यदि प्राकृतिक संसाधनों को समझदारी से संरक्षित किया जाए, तो वे स्वयं अपनी समृद्धि के संकेत देने लगते हैं।
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