by-Ravindra Sikarwar
भारत और अमेरिका के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण व्यापार और भारत का रूसी तेल का निरंतर आयात है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इन मुद्दों पर अपनी निराशा व्यक्त की है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों में तनाव बढ़ गया है।
व्यापार तनाव और अमेरिकी टैरिफ:
अमेरिका और भारत के बीच व्यापार असंतुलन लंबे समय से एक विवाद का विषय रहा है। अमेरिका ने भारत के कुछ उत्पादों पर उच्च टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने के लिए भारत की आलोचना की है, जबकि भारत अमेरिकी व्यापार नीतियों और संरक्षणवाद से निराश है। हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल के आयात को लेकर भारतीय सामानों पर 50% का शुल्क लगाया है, जो दुनिया में सबसे अधिक शुल्कों में से एक है।
ट्रंप ने तर्क दिया है कि भारत अपने उत्पादों को अमेरिका में भेज रहा है, जबकि अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाज़ार में उच्च टैरिफ के कारण प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल का उदाहरण दिया, जिस पर भारत में 200% का शुल्क था। इस टैरिफ के कारण हार्ले-डेविडसन को भारत में एक संयंत्र स्थापित करना पड़ा, जो अमेरिका के लिए एक नकारात्मक बात है।
भारत का रूसी तेल आयात और अमेरिकी दबाव:
भारत, यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से तेल का एक प्रमुख खरीदार बन गया है। यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद, भारत ने रियायती कीमतों पर बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदना शुरू कर दिया। अमेरिका ने भारत की इस कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई है, यह आरोप लगाते हुए कि भारत रूस के युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित कर रहा है। ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि जब तक भारत रूसी तेल की खरीद कम नहीं करता, तब तक वह कोई भी व्यापार प्रस्ताव स्वीकार नहीं करेगा।
भारत ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसा कर रहा है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि भारत के किसी भी देश के साथ संबंध अपनी योग्यता पर आधारित हैं और उन्हें तीसरे देश के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। भारत का यह भी तर्क है कि यूरोपीय देश भी बड़ी मात्रा में रूसी गैस खरीदना जारी रखे हुए हैं।
भारत की प्रतिक्रिया और आगे का रास्ता:
अमेरिकी टैरिफ के बाद, भारत सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार ने व्यापार नीतियों में सुधार लाने और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए समितियों का गठन किया है। भारत के वित्त मंत्री ने भी कहा है कि सरकार उन निर्यातकों को सहायता देगी जो अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए हैं।
भारत के लिए एक बड़ी चुनौती यह है कि वह रूस से मिलने वाली तेल छूट और अमेरिका के विशाल निर्यात बाजार में से किसे प्राथमिकता दे। रूस से सस्ता तेल आयात करने से भारत के लिए मुद्रास्फीति (inflation) को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, जबकि अमेरिका से व्यापारिक संबंध बनाए रखना भारत के लिए रक्षा, प्रौद्योगिकी और निवेश के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है।
यह तनाव दोनों देशों के बीच संबंधों को सबसे निचले स्तर पर ले आया है। कुछ विश्लेषकों ने इस स्थिति की तुलना 1971 के उस दौर से की है, जब अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया था और भारत के प्रति अविश्वास पैदा हुआ था। हालांकि, रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी टैरिफ के बावजूद अमेरिका से सैन्य खरीद जारी है।
