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by-Ravindra Sikarwar

रूसी तेल आयात पर भारत की निर्भरता में वृद्धि और इसके लिए कूटनीतिक और व्यापारिक विकल्प तलाशने की खबरें हैं। अंतरराष्ट्रीय दबाव और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों के बीच भारत इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

रूसी तेल आयात पर भारत की रणनीति:
वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के बाद, भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात काफी बढ़ा दिया है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से रियायती दरों पर तेल खरीद रहा है। यह कदम भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति का हिस्सा है।

प्रमुख कारण और प्रभाव:

  • रियायती दरें: रूस द्वारा कच्चे तेल पर दी जा रही भारी छूट भारत को आकर्षित कर रही है। यह भारत के लिए आयात बिल को कम करने और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में सहायक है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। अपनी बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए, भारत विभिन्न स्रोतों से तेल प्राप्त करना चाहता है, जिसमें रूस एक महत्वपूर्ण भागीदार बनकर उभरा है।
  • कूटनीतिक संतुलन: भारत, रूस के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए, पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।

भारत इस बात पर भी विचार कर रहा है कि कैसे प्रतिबंधों के बावजूद व्यापार को सुचारू रूप से चलाया जाए। इसमें रुपये और रूबल में व्यापार करने जैसे विकल्प भी शामिल हैं ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। इसके अलावा, भारत ने रूसी तेल के आयात के लिए नए शिपिंग और बीमा मार्गों का भी पता लगाया है ताकि आपूर्ति में कोई बाधा न आए।

कुल मिलाकर, भारत की यह रणनीति न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि यह एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर भारत के झुकाव को भी दर्शाती है, जहाँ वह अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।

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