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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: अमेरिका ने ईरान के रणनीतिक महत्व वाले चाबहार बंदरगाह पर भारत की गतिविधियों के लिए छह महीने की विशेष छूट प्रदान की है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रंधीर जायस्वाल ने गुरुवार को इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह छूट 29 अक्टूबर से प्रभावी हो चुकी है। यह कदम नई दिल्ली के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि इससे अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस के साथ व्यापारिक संपर्कों को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए मजबूती मिलेगी। चाबहार बंदरगाह, जो ओमान की खाड़ी में स्थित है, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री द्वार के रूप में उभरा है, जो क्षेत्रीय स्थिरता और मानवीय सहायता के लिए आवश्यक है।

चाबहार परियोजना का इतिहास: भारत-ईरान साझेदारी की नींव
चाबहार बंदरगाह का विकास भारत और ईरान के बीच 2005 से चल रहा है, जब दोनों देशों ने इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 2015 में हस्ताक्षरित एक समझौते (MoU) के तहत, शहीद बेहेश्ती टर्मिनल को संयुक्त रूप से विकसित करने का फैसला हुआ, ताकि यह अफगानिस्तान, मध्य एशियाई देशों और रूस के बाजारों तक पहुंच का प्रमुख केंद्र बने। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, 2018 में तत्कालीन ट्रंप प्रशासन ने भारत को विशेष छूट दी थी, क्योंकि यह अमेरिकी हितों के अनुरूप था – खासकर अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहायता।

मई 2024 में, भारत ने ईरान के साथ 10 वर्षीय संचालन अनुबंध पर दस्तखत किए। इस सौदे के तहत, भारत ने 120 मिलियन डॉलर का निवेश करने और 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन प्रदान करने का वादा किया, जिससे बंदरगाह के बुनियादी ढांचे को अपग्रेड किया जा सके। राज्य-स्वामित्व वाली इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने शहीद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन संभाला है। अब तक, इस बंदरगाह ने 80 लाख टन से अधिक माल की आवाजाही संभाली है, जिसमें अफगानिस्तान के लिए खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति शामिल है। यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का अभिन्न हिस्सा है, जो भारत को ईरान, रूस और मध्य एशिया के साथ मल्टीमॉडल व्यापार मार्ग प्रदान करता है। कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों के माध्यम से रूस भी चाबहार का उपयोग करके भारत और एशिया के अन्य हिस्सों तक व्यापार विस्तार की योजना बना रहा है।

अमेरिकी प्रतिबंधों का संकट और छूट की प्रक्रिया:
सितंबर 2025 में, ट्रंप प्रशासन ने 2018 की छूट को रद्द करने की घोषणा की, जो ईरान फ्रीडम एंड काउंटर-प्रोलिफरेशन एक्ट (IFCA) के तहत दी गई थी। अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि यह कदम राष्ट्रपति ट्रंप की ‘अधिकतम दबाव’ नीति के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को समर्थन देने वाली गतिविधियों को अलग-थलग करना है। 29 सितंबर से प्रभावी इस फैसले ने चाबहार से जुड़े किसी भी व्यक्ति या कंपनी को प्रतिबंधों के जोखिम में डाल दिया, जिसमें संपत्ति जब्ती और अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बहिष्कार शामिल था।

भारत ने तत्काल कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए। विदेश मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि चाबहार का संचालन क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, मानवीय सहायता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान से चाबहार की प्रासंगिकता कुछ घटी, लेकिन यह अभी भी काबुल तक सहायता पहुंचाने का एकमात्र विश्वसनीय मार्ग है। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन की भारत के प्रति सख्ती – जैसे रूस के साथ निकट संबंधों पर नाराजगी और शुल्क लगाना – ने स्थिति को जटिल बना दिया। फिर भी, भारत की दृढ़ कूटनीति ने सफलता हासिल की, और 45 दिनों के भीतर छूट को बहाल कर दिया गया। MEA प्रवक्ता जायस्वाल ने कहा, “हम अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए बातचीत जारी रखे हुए हैं।”

रणनीतिक महत्व: पाकिस्तान को छकाना और क्षेत्रीय लाभ
चाबहार का स्थान पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से मात्र 140 किलोमीटर दूर है, जो चीन द्वारा संचालित है। यह भारत के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है, जो पाकिस्तान पर निर्भरता कम करता है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी समुद्री पहुंच से भारत का व्यापार बढ़ेगा, खासकर ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में। 1.4 अरब आबादी वाले भारत के लिए सस्ती ऊर्जा स्रोतों की विविधता सुनिश्चित करना राष्ट्रीय हित का विषय है। ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंध नीति की आलोचना करता रहा है, लेकिन यह छूट भारत-ईरान संबंधों को मजबूत करती है।

भविष्य की संभावनाएं: अनिश्चितता के बीच आशा
यह छह माह की छूट अस्थायी है, लेकिन यह भारत को परियोजना को आगे बढ़ाने का समय देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे INSTC को गति मिलेगी, जो यूरोप तक छोटा और विश्वसनीय व्यापार मार्ग बनेगा। हालांकि, ट्रंप प्रशासन की कठोर नीतियां भविष्य में चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। MEA ने कहा कि वैश्विक बाजार की बदलती गतिशीलता को ध्यान में रखते हुए, भारत ऊर्जा स्रोतों पर निर्णय लेगा। यह घटना भारत की कूटनीतिक कुशलता का प्रमाण है, जो वैश्विक दबावों के बीच राष्ट्रीय हितों की रक्षा करती है। चाबहार न केवल एक बंदरगाह है, बल्कि भारत की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक है – जहां सहयोग और रणनीति मिलकर नई ऊंचाइयां छूती हैं।