by-Ravindra Sikarwar
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 13 नवंबर 2025 को एक ऐसी घोषणा हुई, जिसने पूरे देश को हलचल में डाल दिया। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-1 (आईसीटी-1) ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनके दो प्रमुख सहयोगियों के खिलाफ मानवता के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामले में फैसला सुनाने की तारीख तय कर दी है। यह फैसला 17 नवंबर 2025 को दोपहर 12 बजे सुनाया जाएगा। यह केस पिछले साल जुलाई के विशाल विद्रोह (जुलाई अपराइजिंग) के दौरान कथित क्रूर दमन से जुड़ा है, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान गई थी। हसीना पर आरोप है कि उन्होंने अपनी सत्ता बचाने के लिए सुरक्षा बलों को निर्दोष प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया था।
मामले का पूरा पृष्ठभूमि:
शेख हसीना, जो 2009 से 2024 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं, पर यह मुकदमा जून 2025 में शुरू हुआ था। मुकदमा उनकी अनुपस्थिति में चला, क्योंकि वे अगस्त 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के दौरान देश छोड़कर भारत चली गईं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई-अगस्त 2024 के बीच हसीना सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों पर दमन के दौरान कम से कम 1,400 लोग मारे गए थे। अभियोजन पक्ष ने हसीना को सत्ता पर काबिज रहने की हवस में निर्दोष छात्रों और नागरिकों पर व्यवस्थित हमले का जिम्मेदार ठहराया है।
मामले में कुल पांच आरोप लगाए गए हैं, जो बांग्लादेशी कानून के तहत मानवता के खिलाफ अपराधों के दायरे में आते हैं:
- हत्या को रोकने में विफलता: हसीना पर आरोप है कि उन्होंने जुलाई 2024 में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आदेश दिए, जिससे दर्जनों मौतें हुईं।
- अन्यायपूर्ण हत्या: ढाका और उसके आसपास के इलाकों में छह निहत्थे प्रदर्शनकारियों, जिनमें छात्र भी शामिल थे, की गोलीबारी से हत्या।
- सुरक्षा बलों की सहायता और उकसावा: पूर्व गृह मंत्री आसदुज्जमां खान कमाल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामून पर आरोप है कि उन्होंने हसीना के निर्देशों पर अमल करते हुए हमलों को अंजाम दिया।
- व्यवस्थित दमन: 14 जुलाई 2024 को हसीना के प्रेस ब्रीफिंग के बाद उच्च अधिकारियों ने निर्दोष छात्रों पर हमला किया, जिसमें सैकड़ों घायल हुए।
- राज्य-प्रायोजित हिंसा: प्रदर्शन को कुचलने के लिए सेना और पुलिस का इस्तेमाल, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की रिपोर्ट में ‘व्यवस्थित नरसंहार’ जैसा बताया गया।
अभियोजन पक्ष ने हसीना और कमाल के लिए अधिकतम सजा—मौत की सजा—की मांग की है। पूर्व आईजीपी मामून ने दोषी मान लिया है और राज्य गवाह बन चुके हैं, इसलिए उनकी सजा अदालत के विवेक पर निर्भर करेगी। सुनवाई 1 जून 2025 से शुरू होकर 23 अक्टूबर 2025 को समाप्त हुई, जिसमें 54 गवाहों ने बयान दिए।
मुख्य आरोपी और उनकी स्थिति:
- शेख हसीना (78 वर्षीय): फरार, भारत में रह रही हैं। उन्होंने अदालत के समन को नजरअंदाज किया और हालिया साक्षात्कारों में इस ट्रिब्यूनल को ‘राजनीतिक विरोधियों द्वारा संचालित कंगारू कोर्ट’ बताया। वे भारत में शरणार्थी के रूप में रह रही हैं, लेकिन बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने उनका प्रत्यर्पण मांगा है, जिस पर भारत ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
- आसदुज्जमां खान कमाल (पूर्व गृह मंत्री): फरार, संभवतः भारत में। वे हसीना के करीबी सहयोगी थे और दमन अभियान के प्रमुख सूत्रधार माने जाते हैं।
- चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामून (पूर्व आईजीपी): हिरासत में, दोषी ठहराए जाने पर राज्य गवाह बने।
यह पहला मामला है जो पुनर्गठित ट्रिब्यूनल में हसीना के खिलाफ दर्ज किया गया। उनके खिलाफ दो अन्य मुकदमे भी चल रहे हैं: एक उनके कार्यकाल में जबरन गुमशुदगी और हत्याओं पर, दूसरा 2013 के हेफाजत-ए-इस्लाम रैली पर दमन से जुड़ा।
देश में बढ़ता तनाव और विरोध प्रदर्शन:
फैसले की तारीख की घोषणा के साथ ही बांग्लादेश में तनाव चरम पर पहुंच गया है। हसीना की अवामी लीग पार्टी, जो अब अवैध घोषित हो चुकी है, ने 13 नवंबर को ‘ढाका लॉकडाउन’ का आह्वान किया। पार्टी ने अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस के इस्तीफे और ट्रिब्यूनल के विघटन की मांग की है। 14 और 15 नवंबर को राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन और जागरूकता अभियान, जबकि 16 और 17 नवंबर को पूर्ण हड़ताल का ऐलान किया गया है।
ढाका में आईसीटी भवन के आसपास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पुलिस, बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी), सशस्त्र पुलिस बटालियन (एपीबीएन) और सेना की टुकड़ियां तैनात हैं। आर्मर्ड वाहनों से चेकपॉइंट्स पर निगरानी हो रही है। विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने भी सतर्कता बरतने का आह्वान किया है, क्योंकि फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनावों से पहले यह फैसला राजनीतिक समीकरण बदल सकता है।
बांग्लादेश की विदेश मंत्रालय ने 12 नवंबर को भारत के राजदूत को तलब किया और मांग की कि हसीना को पत्रकारों से बात करने से रोका जाए। अंतरिम सरकार का कहना है कि हसीना की मीडिया पहुंच न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और प्रभाव:
अभियोजन पक्ष के प्रमुख मोहम्मद ताजुल इस्लाम ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि अदालत न्याय की प्यास बुझाएगी और यह फैसला मानवता के खिलाफ अपराधों का अंत साबित होगा।” हसीना ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है और इसे ‘कानूनी मजाक’ बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बांग्लादेश की राजनीति को नया मोड़ देगा, खासकर अवामी लीग के समर्थकों और विरोधियों के बीच। भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि हसीना भारत की करीबी मानी जाती थीं।
ट्रिब्यूनल के चेयरमैन जस्टिस मोहम्मद गोलम मोर्तुजा मजुमदार की अगुवाई में तीन सदस्यीय बेंच फैसला सुनाएगी। यह केस न केवल हसीना के राजनीतिक भविष्य को तय करेगा, बल्कि बांग्लादेश में लोकतंत्र और न्याय की दिशा भी निर्धारित करेगा। फैसले के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल देश सांस थामे इंतजार कर रहा है। अपडेट्स के लिए आधिकारिक स्रोतों पर नजर रखें।
