by-Ravindra Sikarwar
कोलकाता: कोलकाता हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि नाबालिग आरोपी भी अपराध के मामले में गिरफ्तारी की आशंका होने पर अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) के लिए आवेदन कर सकते हैं। तीन जजों की खंडपीठ ने जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 में इस तरह की किसी रोक का कोई प्रावधान नहीं होने का हवाला देते हुए यह अधिकार प्रदान किया। अदालत ने कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को केवल आयु के आधार पर नकारा नहीं जा सकता।
यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है, क्योंकि इससे पहले किसी भी हाईकोर्ट ने नाबालिगों के लिए अग्रिम जमानत के मुद्दे पर इतनी विस्तृत और स्पष्ट व्याख्या नहीं की थी। कानूनी विशेषज्ञों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं के बीच इस निर्णय ने व्यापक बहस को जन्म दिया है, जो बच्चों के अधिकारों और आपराधिक न्याय प्रणाली के बीच संतुलन पर केंद्रित है।
मामले की पृष्ठभूमि और याचिका का उद्गम:
यह पूरा विवाद पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के रघुनाथगंज थाने में दर्ज पुराने आपराधिक मामलों से जुड़ा है। चार नाबालिग लड़कों ने गिरफ्तारी की संभावना को देखते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका मुख्य सवाल था कि क्या वे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत मांग सकते हैं, जो सामान्यतः वयस्क आरोपियों के लिए उपलब्ध है।
पहले दो जजों की पीठ में इस मुद्दे पर मतभेद उभरा, क्योंकि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को लेकर व्याख्याएं अलग-अलग थीं। इसलिए मामले को बड़ी बेंच (तीन जजों की डिवीजन बेंच) के पास रेफर कर दिया गया। अंततः शुक्रवार को आए फैसले ने इस कानूनी असमंजस को समाप्त कर दिया और नाबालिगों के पक्ष में निर्णय सुनाया।
अदालत के फैसले के प्रमुख चार बिंदु:
खंडपीठ ने अपने निर्णय को विस्तार से बताते हुए निम्नलिखित मुख्य तर्क दिए:
- बहुमत की राय (दो जजों का मत): जस्टिस जय सेनगुप्ता और जस्टिस तीर्थंकर घोष ने सर्वसम्मति से कहा कि नाबालिगों को अग्रिम जमानत से वंचित रखना बाल संरक्षण की मूल भावना के विपरीत है। उनका तर्क था कि यदि वयस्क व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले राहत मिल सकती है, तो नाबालिग को इससे क्यों वंचित किया जाए? जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का उद्देश्य बच्चों की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करना है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत देते समय विशेष शर्तें लगाई जा सकती हैं, ताकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की प्रक्रियाएं प्रभावित न हों। बोर्ड का अधिकार क्षेत्र केवल गिरफ्तारी के बाद ही सक्रिय होता है, इससे पहले अग्रिम जमानत का प्रावधान लागू हो सकता है।
- असहमति का मत (एक जज की राय): जस्टिस बिवास पटनायक ने बहुमत के निर्णय से असहमति जताई। उनके अनुसार, अग्रिम जमानत का प्रावधान जुवेनाइल जस्टिस प्रणाली की मूल संरचना को कमजोर कर सकता है। एक्ट पूरा का पूरा ढांचा गिरफ्तारी के बाद बच्चों के पुनर्वास और कल्याण पर आधारित है, और एंटीसिपेटरी बेल इससे छेड़छाड़ कर सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे अपराधियों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, बहुमत की राय के कारण असहमति अल्पमत में रही।
- जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में कोई स्पष्ट रोक नहीं: पीठ ने एक्ट की विभिन्न धाराओं का गहन विश्लेषण किया और पाया कि कहीं भी अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध का उल्लेख नहीं है। इसलिए, CrPC की धारा 438 को नाबालिगों पर लागू करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि यह अधिकार सभी नागरिकों के लिए समान है, चाहे उनकी आयु कुछ भी हो।
- व्यावहारिक दिशानिर्देश: फैसले में अदालत नेlower courts को निर्देश दिए कि नाबालिगों की अग्रिम जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय मामले की गंभीरता, बच्चे की उम्र, अपराध की प्रकृति और बोर्ड की भूमिका को ध्यान में रखा जाए। जमानत की शर्तों में स्कूल उपस्थिति, अभिभावक निगरानी या काउंसलिंग जैसी बिंदु शामिल किए जा सकते हैं।
अग्रिम जमानत क्या है और इसका महत्व:
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत एक预防ात्मक राहत है, जिसमें आरोपी गिरफ्तारी की आशंका होने पर अदालत से अनुमति लेता है कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन तुरंत जमानत पर रिहा करना होगा। यह प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाया गया है, ताकि बिना सबूत के उत्पीड़न न हो। अब नाबालिगों के लिए यह उपलब्ध होने से पुलिस की मनमानी पर अंकुश लगेगा और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
फैसले के व्यापक प्रभाव:
- बाल अधिकारों पर: यूनीसेफ और अन्य संगठनों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय बच्चों को अनावश्यक हिरासत से बचाएगा, जो उनकी शिक्षा और विकास को प्रभावित करती है।
- न्यायिक प्रणाली पर: अन्य हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस फैसले का अनुसरण कर सकते हैं, जिससे पूरे देश में एकसमान नीति बनेगी।
- विवादास्पद पक्ष: कुछ कानूनविद् चिंता जताते हैं कि इससे जुवेनाइल अपराध बढ़ सकते हैं, लेकिन अदालत ने शर्तों के माध्यम से इस जोखिम को कम करने का प्रावधान किया है।
कोलकाता हाईकोर्ट का यह निर्णय न केवल पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे भारत के लिए मिसाल बनेगा। याचिकाकर्ता नाबालिगों को तत्काल राहत मिली है, और अब उनकी जमानत अर्जियां संबंधित सत्र अदालतों में विचार के लिए भेजी जाएंगी। यह फैसला बाल न्याय की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।
