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By: Ravindra Sikarwar

मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच ने एक दुष्कर्म पीड़िता के साथ पुलिस थाने में हुई अभद्रता और दुर्व्यवहार के मामले में बेहद कड़ी नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने इसे न सिर्फ कानून व्यवस्था के लिए शर्मनाक बताया बल्कि पुलिस महकमे की संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने ग्वालियर के पुलिस अधीक्षक को तत्काल प्रभाव से गिरवाई थाना प्रभारी (टीआई) और संबंधित डिप्टी एसपी (डीएसपी) के खिलाफ अनुशासनात्मक एवं विभागीय कार्रवाई शुरू करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जो महिला अपनी इज्जत लुटने की शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंची, उसी के साथ पुलिसकर्मियों ने दुर्व्यवहार किया, उसकी बेइज्जती की और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। कोर्ट ने इसे “पुलिस की घोर संवेदनहीनता और कर्तव्य से विचलन” करार दिया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पीड़ित महिला पहले ही अपराध की शिकार हो चुकी है, ऐसे में पुलिस का दायित्व उसकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना है, न कि उसे और अपमानित करना।

दरअसल, मामला कुछ महीने पुराना है। एक युवती ने ग्वालियर के गिरवाई थाने में अपने साथ हुए दुष्कर्म की लिखित शिकायत दी थी। आरोप है कि थाना प्रभारी और डीएसपी ने न सिर्फ उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया बल्कि उसे तरह-तरह से तंग किया, धमकाया और थाने से भगा दिया। पीड़िता का कहना था कि पुलिसवालों ने उससे अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, उसकी निजी जिंदगी पर उंगलियां उठाईं और यहाँ तक कहा कि “तुम जैसी लड़कियां खुद ही ऐसा होने देती हैं।” इस व्यवहार से आहत होकर पीड़िता ने हाईकोर्ट की शरण ली और वहां याचिका दायर कर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गुहार लगाई।

हाईकोर्ट ने याचिका पर त्वरित संज्ञान लिया और मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस महानिदेशक तथा ग्वालियर रेंज के आईजी से भी जवाब तलब किया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में मौजूद अधिकारियों को फटकार लगाते हुए जज ने कहा, “यदि पुलिस ही पीड़ितों का इस तरह मजाक उड़ाएगी, उनसे बद्तमीजी करेगी तो आम आदमी कहां जाएगा? यह व्यवस्था का पूरी तरह से चेहरा खराब करने वाला कृत्य है।”

कोर्ट ने अपने आदेश में तीन प्रमुख बातें स्पष्ट कीं:

1. ग्वालियर एसपी तुरंत दोनों अधिकारियों (थाना प्रभारी और डीएसपी) के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करें और कार्रवाई करें।

2. जांच किसी ईमानदार और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपी जाए, जो निष्पक्ष रूप से पूरे मामले की तह तक जाए।

3. जांच रिपोर्ट तय समय सीमा में हाईकोर्ट को प्रस्तुत की जाए, साथ ही पीड़िता को सुरक्षा और उचित कानूनी सहायता मुहैया कराई जाए।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि दुष्कर्म के मूल मामले में तेजी से चार्जशीट दाखिल की जाए और पीड़िता के बयान जल्द से जल्द मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हों। साथ ही थाने में महिलाओं के साथ होने वाले किसी भी तरह के दुर्व्यवहार को रोकने के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी करने को कहा गया है।

इस फैसले के बाद ग्वालियर पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक एसपी ने दोनों अधिकारियों को तत्काल लाइन अटैच कर दिया है और जांच के लिए एक एएसपी रैंक के अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी गई है। महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है और इसे “पीड़ितों के लिए बड़ी राहत” बताया है। उनका कहना है कि अक्सर थानों में दुष्कर्म या छेड़खानी की शिकायत लेकर आने वाली महिलाओं के साथ पुलिस का यही रवैया रहता है, जिसके कारण कई पीड़िताएं चुप रहना पसंद करती हैं।

हाईकोर्ट का यह कदम न सिर्फ ग्वालियर बल्कि पूरे प्रदेश की पुलिस व्यवस्था के लिए एक कड़ा संदेश है कि पीड़ितों के साथ संवेदनशीलता बरतना कोई विकल्प नहीं, बल्कि पुलिस का मूल कर्तव्य है। यदि पुलिस ही अपराधियों की पक्षधर बन जाए या पीड़ितों को अपमानित करे, तो न्याय की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो जाती है।