Report by: Ravindra Singh
Gariaband : छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में किडनी की गंभीर बीमारी एक महामारी का रूप लेती जा रही है। वर्षों से ‘सुपेबड़ा’ गांव अपनी त्रासदी के लिए चर्चा में था, लेकिन अब फिंगेश्वर विकासखंड का पथर्री गांव नए ‘डेथ जोन’ के रूप में उभर रहा है। यहाँ लगातार हो रही मौतों और बीमारी के फैलते दायरे ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Gariaband मौत का आंकड़ा और ग्रामीणों में बढ़ती दहशत
पथर्री गांव में स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो चुकी है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, पिछले महज 24 महीनों (दो साल) के भीतर 7 लोगों की जान किडनी की बीमारी के कारण जा चुकी है। वर्तमान में लगभग 10 ग्रामीण इस जानलेवा बीमारी की चपेट में हैं और जीवन-मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। गांव में हर दूसरे घर में बीमारी की आहट ने लोगों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि मौतों का सिलसिला जारी है, लेकिन तंत्र अब भी गहरी नींद में है।
Gariaband दूषित पानी: क्या प्यास बुझाना ही बन रहा मौत का कारण?
इस बीमारी के मूल कारण के रूप में अशुद्ध पेयजल को सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन द्वारा पूर्व में की गई पानी की जांच में कुछ हैंडपंपों और जल स्रोतों का पानी ‘पीने योग्य’ नहीं पाया गया था। पानी में भारी धातुओं (Heavy Metals) या फ्लोराइड की अधिक मात्रा होने की आशंका है, जो सीधे किडनी पर हमला करती है। इसके बावजूद, गांव में अब तक शुद्ध पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई है, जिससे ग्रामीण वही जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं।
Gariaband प्रशासन की अनदेखी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
पथर्री के निवासियों का कहना है कि सुपेबड़ा की घटना के बाद प्रशासन को सतर्क हो जाना चाहिए था, लेकिन पथर्री की ओर ध्यान तभी दिया गया जब स्थिति हाथ से निकलने लगी। गांव में स्वास्थ्य शिविरों का अभाव है और बीमार लोगों को इलाज के लिए शहर के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जिससे उन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है। ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में नियमित स्वास्थ्य जांच शिविर लगाए जाएं और प्रत्येक ग्रामीण का ‘स्क्रीनिंग टेस्ट’ किया जाए ताकि शुरुआती स्टेज में बीमारी का पता चल सके।
Gariaband समाधान की मांग: स्थायी व्यवस्था की दरकार
पथर्री गांव के लोग अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। उनकी प्रमुख मांगों में शामिल हैं:
- गांव में तत्काल विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम भेजी जाए।
- बीमार लोगों को मुफ्त डायलिसिस और उच्च स्तरीय इलाज की सुविधा मिले।
- गांव में ‘नल-जल योजना’ के तहत शुद्ध फिल्टर पानी की आपूर्ति शुरू हो।
- दूषित घोषित किए गए जल स्रोतों को तत्काल सील किया जाए।
यह संकट केवल एक गांव का नहीं, बल्कि पूरे गरियाबंद जिले के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पथर्री की स्थिति सुपेबड़ा से भी बदतर हो सकती है।
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