Bhopal BridgeBhopal Bridge
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Report by: Ravindra Singh

Bhopal Bridge : राजधानी भोपाल के ऐशबाग क्षेत्र में बना वह विवादित पुल एक बार फिर सुर्खियों में है, जिसे अपनी अजीबोगरीब बनावट के कारण ‘देश का सबसे बदनाम पुल’ कहा जाने लगा था। मात्र 18 करोड़ की लागत से तैयार इस पुल को इंजीनियरों ने 90 डिग्री के घुमावदार डिजाइन में बना दिया था, जिससे इस पर चलना जान जोखिम में डालने जैसा हो गया। अब खबर है कि इस ढांचे को ध्वस्त कर दोबारा डिजाइन किया जाएगा, लेकिन इस फैसले ने सरकारी कार्यप्रणाली और जनता के पैसे की बर्बादी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Bhopal Bridge 18 करोड़ की लागत और इंजीनियरों का ‘अजीब’ कारनामा

लोक निर्माण विभाग (PWD) के इंजीनियरों की देखरेख में बना यह पुल जब पिछले साल तैयार हुआ, तो इसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। देश में शायद ही कहीं ऐसा पुल होगा जिसे एकदम 90 डिग्री के कोण पर मोड़ दिया गया हो। उद्घाटन के समय जब मीडिया में इसकी तस्वीरें वायरल हुईं, तब जाकर प्रशासन की नींद खुली। आनन-फानन में कुछ छोटे अधिकारियों को निलंबित कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई, लेकिन मुख्य जिम्मेदार अब भी बचते नजर आ रहे हैं।

Bhopal Bridge जनता की गाढ़ी कमाई पर फिर फिरेगा पानी?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो 18 करोड़ रुपये पहले ही खर्च हो चुके हैं, उसका हिसाब कौन देगा? पुल को दोबारा डिजाइन करने का मतलब है पुराने निर्माण को तोड़ना और नए सिरे से करोड़ों रुपये खर्च करना। क्या यह सीधे तौर पर टैक्सपेयर्स के पैसे की बर्बादी नहीं है? एक तरफ सरकार बजट की कमी का रोना रोती है और दूसरी तरफ योजना के अभाव में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं।

Bhopal Bridge पुरानी गलती से नहीं सीखा सबक: उसी ठेकेदार को फिर काम!

हैरानी की बात तो यह है कि जिस ठेकेदार की देखरेख में यह दोषपूर्ण पुल बना, सरकार ने दोबारा उसी को इसके पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी सौंप दी है। इसे लेकर जनता और विशेषज्ञों में भारी नाराजगी है। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार के पास विकल्पों की कमी है या फिर वही ‘पुराना गठजोड़’ इस फिजूलखर्ची के पीछे काम कर रहा है। बिना काली सूची (Blacklist) में डाले उसी ठेकेदार को दोबारा काम देना व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

Bhopal Bridge क्रेडिट की होड़ से किरकिरी तक का सफर

जब पुल बनकर तैयार हुआ था, तब बड़े-बड़े नेता इसका श्रेय लेने और उद्घाटन करने की होड़ में लगे थे। लेकिन जैसे ही तकनीकी खामी उजागर हुई, सभी ने पल्ला झाड़ लिया। जांच कमेटी बनी, इंजीनियरों पर गाज गिरी, लेकिन नीतिगत निर्णय लेने वाले सफेदपोशों पर कोई आंच नहीं आई। अब देखना यह होगा कि दोबारा बनने वाला यह पुल वास्तव में जनता के काम आता है या फिर यह भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक नया स्मारक बनकर रह जाता है।

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