Barsana : ब्रज भूमि पर होली का रंग हर साल नई उमंग और उत्साह के साथ खिल उठता है। विश्वप्रसिद्ध लट्ठमार होली के लिए नंदगाँव के ग्वाले, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘होरियारे’ कहा जाता है, पूरी शान और धाक के साथ बरसाना पहुँच चुके हैं। राधा रानी की नगरी की देहरी पर कदम रखते ही ये टोली पीली पोखर में डेरा डालती है, जहां से सदियों पुरानी द्वापरकालीन परंपरा को निभाने की अंतिम तैयारियां शुरू होती हैं।
पाग का सुरक्षा कवच: लाठियों की मार सहने की कला
Barsana पीली पोखर के किनारे होरियारों के बीच उत्साह देखने योग्य है। इस उत्सव का मुख्य आकर्षण है पाग (पगड़ी) बाँधना, जो सिर्फ श्रृंगार का हिस्सा नहीं बल्कि सुरक्षा कवच का काम भी करती है।
- विशिष्ट तकनीक: लंबा और मोटा सूती कपड़ा विशेष तरीके से सिर पर लपेटा जाता है।
- रक्षा कवच: यह पाग भारी लाठियों से बचाव करता है, जिन्हें बरसाना की गोपियाँ (हुरियारिनें) उत्सव के दौरान चलाती हैं।
- वीरता का प्रतीक: ग्वाले इसे इतनी मजबूती से बाँधते हैं कि लट्ठमार होली के दौरान सिर पर चोट का असर न पड़े और वे पूरे उत्साह के साथ ‘युद्ध’ में टिके रहें।
इस अनोखी कला में ग्वालों की शारीरिक ताकत और साहस झलकता है, जो इस परंपरा को और भी जीवंत बनाता है।
द्वापरकालीन प्रेम और परंपरा: कान्हा और राधा का रंग
Barsana स्थानीय मान्यता है कि लट्ठमार होली की नींव स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने रखी थी। पुराने समय में जब कान्हा अपने सखाओं के साथ बरसाना होली खेलने आते थे, तो गोपियाँ उन्हें लाठियों से रोकती थीं।
- अटूट परंपरा: युग बदल गए, लेकिन उत्सव का भाव वही रहा। नंदगाँव के ग्वाले आज भी खुद को कान्हा का सखा मानकर बरसाना की गलियों में प्रवेश करते हैं।
- प्रेम का प्रतीक: एक बुजुर्ग होरियारे बताते हैं, “यह होली हार-जीत का खेल नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम का उत्सव है, जिसमें हम भीगने आते हैं।”
रंगीली गली में ऐतिहासिक स्वागत
Barsana पीली पोखर में जुटी टोली अब ढोल-नगाड़ों की थाप और भांग-ठंडाई की मस्ती में मग्न है। लोकगीतों की गूँज और ‘राधे-राधे’ के जयकारों से पूरा माहौल जीवंत हो गया है।
- अगला पड़ाव: कुछ ही समय में यह टोली रंगीली गली की ओर कूच करेगी, जो लट्ठमार होली का मुख्य केंद्र है।
- हुरियारिनों की तैयारी: वहां गोपियाँ हाथों में तेल पिलाए लट्ठ लेकर ग्वालों का स्वागत करने के लिए तैयार खड़ी हैं।
- सतरंगी माहौल: पूरे बरसाना में अबीर-गुलाल की चादर बिछी है, जिससे आसमान भी सतरंगी प्रतीत हो रहा है।
बरसाना की गलियों में यह उत्सव न केवल संस्कृति और परंपरा का प्रतीक है, बल्कि द्वापरकालीन प्रेम और ब्रज की जीवंत होली की झलक भी पेश करता है।
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