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by-Ravindra Sikarwar

गुवाहाटी, असम: असम सरकार ने राज्य में वयस्कों के लिए आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से बंद करने का फैसला किया है। सरकार ने इस फैसले के पीछे राज्य में अवैध रूप से रह रहे “बांग्लादेशी” नागरिकों की बड़ी संख्या का हवाला दिया है। सरकार का मानना है कि आधार कार्ड जारी करने से इन अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता का प्रमाण मिल सकता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

सरकार का तर्क और चिंताएँ:
असम सरकार का कहना है कि आधार कार्ड एक विशिष्ट पहचान पत्र है, जो भारत के निवासियों को दिया जाता है। लेकिन राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में, यदि वयस्कों को आधार कार्ड जारी किए जाते हैं, तो यह अवैध आप्रवासियों के लिए एक कानूनी दस्तावेज के रूप में काम कर सकता है। इस फैसले के पीछे यह चिंता है कि आधार कार्ड का उपयोग बैंक खाते खोलने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और अन्य आधिकारिक प्रक्रियाओं में किया जा सकता है, जिससे अवैध प्रवासियों को देश में अपनी स्थिति को मजबूत करने का मौका मिलेगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि “हम अपनी सीमावर्ती राज्य की संवेदनशीलता को देखते हुए कोई जोखिम नहीं ले सकते। जब तक एनआरसी की प्रक्रिया अंतिम रूप से पूरी नहीं हो जाती, तब तक वयस्कों को आधार कार्ड जारी करना एक बड़ी सुरक्षा चूक होगी।”

नागरिकों पर प्रभाव:
सरकार के इस फैसले का सीधा असर राज्य के उन लाखों वयस्कों पर पड़ेगा, जिनके पास अभी तक आधार कार्ड नहीं है। उन्हें अब विभिन्न सरकारी सेवाओं, जैसे कि सब्सिडी, पेंशन, और बैंक खातों से संबंधित प्रक्रियाओं में दिक्कतें आ सकती हैं। हालाँकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध केवल वयस्कों पर लागू होगा और बच्चों के लिए आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया जारी रहेगी, क्योंकि उनकी पहचान उनके माता-पिता के दस्तावेजों के आधार पर की जाती है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया:
इस फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ मिली-जुली हैं। भाजपा सरकार का समर्थन करने वाले समूहों का मानना है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में है। वहीं, विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया है। उनका तर्क है कि यह फैसला उन वास्तविक भारतीय नागरिकों को परेशान करेगा जिनके पास अभी तक आधार कार्ड नहीं है। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह कदम राज्य के लोगों को दो श्रेणियों में बाँट सकता है और सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।

सरकार ने फिलहाल इस फैसले को वापस लेने के संकेत नहीं दिए हैं और कहा है कि यह तब तक लागू रहेगा जब तक एनआरसी का मामला पूरी तरह से सुलझ नहीं जाता। इस बीच, यह देखना होगा कि इस फैसले का राज्य की आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है।