By: Ravindra Singh
Shukra Pradosh Vrat : शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को शुक्र प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में शिव परिवार की पूजा करने और व्रत कथा का पाठ करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को शुक्र प्रदोष कहा जाता है। इसे वैवाहिक जीवन में खुशहाली, सौभाग्य और पारिवारिक सुख के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। आइए जानते हैं शुक्र प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इससे जुड़ी पौराणिक कथा।
शुक्र प्रदोष व्रत 2026: पूजा का शुभ मुहूर्त
23 अक्टूबर को शुक्र प्रदोष व्रत की पूजा के लिए शाम का समय शुभ माना गया है। इस दिन भगवान शिव की आराधना प्रदोष काल में की जाती है।
- तारीख: 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार
- पूजा का शुभ समय: शाम 5:44 बजे से रात 8:16 बजे तक
- आराध्य देव: भगवान शिव और माता पार्वती
- व्रत का महत्व: सुख-समृद्धि, सौभाग्य और दांपत्य जीवन में खुशहाली की कामना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल अर्पित करके भगवान शिव की पूजा करना और व्रत कथा पढ़ना शुभ माना जाता है।
क्यों खास है शुक्र प्रदोष व्रत?
हिंदू मान्यताओं में सप्ताह के अलग-अलग दिनों में पड़ने वाले प्रदोष व्रतों के अलग नाम और महत्व बताए गए हैं। सोमवार को सोम प्रदोष, मंगलवार को भौम प्रदोष, शनिवार को शनि प्रदोष और शुक्रवार को शुक्र प्रदोष कहा जाता है।
शुक्रवार का संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है, जिसे सुख-सुविधाओं, वैवाहिक जीवन और ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से शुक्र प्रदोष व्रत को दांपत्य जीवन में मधुरता, पारिवारिक शांति और सौभाग्य की कामना के लिए विशेष माना जाता है। भक्त इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
शुक्र प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन समय में एक नगर में तीन मित्र रहते थे। उनमें से एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण का पुत्र और तीसरा एक धनी व्यापारी का बेटा था। तीनों विवाहित थे, लेकिन व्यापारी के बेटे की पत्नी का गौना होना अभी बाकी था।
एक दिन तीनों मित्र आपस में महिलाओं और वैवाहिक जीवन के बारे में बातचीत कर रहे थे। उस दौरान ब्राह्मण पुत्र ने पत्नी के महत्व को बताते हुए कहा कि जिस घर में स्त्री नहीं होती, वह घर सूना लगता है। उसकी बात सुनकर व्यापारी के बेटे ने अपनी पत्नी को ससुराल से विदा कराकर घर लाने का फैसला कर लिया।
माता-पिता की सलाह को किया नजरअंदाज
जब व्यापारी के बेटे ने अपने माता-पिता को अपनी योजना बताई, तो उन्होंने उसे समझाया कि उस समय शुक्र अस्त थे। ऐसी स्थिति में बहू-बेटियों की विदाई को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ नहीं माना जाता था। हालांकि, बेटे ने उनकी बात नहीं मानी और पत्नी को लाने के लिए ससुराल रवाना हो गया।
वहां पहुंचने पर पत्नी के माता-पिता ने भी उसे कुछ समय इंतजार करने की सलाह दी, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। आखिरकार वह पत्नी को विदा कराकर अपने घर के लिए निकल पड़ा।
रास्ते में आईं कई परेशानियां
घर लौटते समय दोनों को एक के बाद एक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। रास्ते में उनकी बैलगाड़ी का पहिया निकल गया और बैल की टांग घायल हो गई। इस हादसे में पति-पत्नी को भी चोटें आईं। इसके बावजूद उन्होंने आगे की यात्रा जारी रखी।
कुछ दूर जाने के बाद डाकुओं ने उन्हें घेर लिया और उनका धन लूटकर ले गए। किसी तरह दोनों अपने घर पहुंचे, लेकिन मुसीबतें यहीं समाप्त नहीं हुईं। घर पहुंचने के बाद व्यापारी के बेटे को सांप ने डस लिया।
परिवार ने तुरंत वैद्य को बुलाया। वैद्य ने उसकी हालत देखकर बताया कि उसके बचने की संभावना बहुत कम है और वह तीन दिन के भीतर दम तोड़ सकता है। यह सुनकर परिवार के लोग बेहद चिंतित हो गए।
शुक्र प्रदोष व्रत के प्रभाव से दूर हुए कष्ट
जब ब्राह्मण पुत्र को अपने मित्र की स्थिति के बारे में जानकारी मिली, तो वह उसके घर पहुंचा। उसने व्यापारी के बेटे के माता-पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। साथ ही उसने सुझाव दिया कि बेटे को उसकी पत्नी के साथ वापस ससुराल भेज दिया जाए।
ब्राह्मण पुत्र की सलाह मानकर व्यापारी के बेटे के माता-पिता ने पूरी श्रद्धा के साथ शुक्र प्रदोष व्रत किया। इसके बाद बेटे को उसकी पत्नी सहित वापस ससुराल भेज दिया गया।
धार्मिक कथा के अनुसार, ससुराल पहुंचने के बाद व्यापारी के बेटे की तबीयत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा और उसके जीवन पर मंडरा रहा संकट टल गया। इस तरह शुक्र प्रदोष व्रत के महत्व को दर्शाने वाली यह कथा प्रचलित हुई।
शुक्र प्रदोष व्रत पर कैसे करें भगवान शिव की पूजा?
शुक्र प्रदोष के दिन श्रद्धालु अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं।
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की सफाई करके भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल अर्पित करें। परंपरा के अनुसार बेलपत्र, फूल और फल चढ़ाएं।
- भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें और शिव परिवार की आराधना करें।
- शुक्र प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
- पूजा के अंत में भगवान शिव और माता पार्वती से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
शुक्र प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्र प्रदोष व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है। इस दिन भगवान शिव की आराधना परिवार में सुख-समृद्धि, वैवाहिक जीवन में मधुरता और जीवन की परेशानियों से मुक्ति की कामना के लिए की जाती है।
ध्यान दें: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इसे आस्था के दृष्टिकोण से समझें। इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि का दावा नहीं किया जाता।

