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By: Ravindra Sikarwar

1. जब सोवियत नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में अमेरिका को खदेड़ दिया
यह बात दिसंबर 1971 की है। बंगाल की खाड़ी में अमेरिका का सातवाँ बेड़ा (Task Force 74) एयरक्राफ्ट कैरियर USS Enterprise के नेतृत्व में भारत को धमकाने आया था। उसका मकसद साफ था – पाकिस्तान को बचाना और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में भारत की जीत रोकना। अमेरिकी जहाज़ों ने भारतीय तट की तरफ़ रुख किया तो लगा कि अब तीसरा मोर्चा खुल जाएगा। 
लेकिन ठीक उसी वक्त हिंद महासागर से सोवियत नौसेना का 10वाँ ऑपरेटिव बैटल ग्रुप तेज़ी से बढ़ा। इसमें परमाणु शक्ति से लैस क्रूज़र, डिस्ट्रॉयर और न्यूक्लियर सबमरीन शामिल थे। कमांडर एडमिरल व्लादिमीर क्रुगल्याकोव ने अमेरिकी बेड़े को सीधा संदेश भिजवाया – “अगर आपने एक भी गोली चलाई तो हम आपकी पूरी फ्लीट डुबो देंगे।” अमेरिका पीछे हटा। उस दिन सोवियत संघ ने साबित कर दिया कि मुसीबत की घड़ी में भारत का साथ देने वाला कोई है तो वो मॉस्को है। यह दोस्ती का पहला बड़ा इम्तिहान था और रूस ने इसे सोने के अक्षरों में पास किया।

2. हथियारों की वो दोस्ती जो कभी बिकती नहीं, बनती है
पचास-साठ के दशक में जब पश्चिमी देश भारत को हथियार देने में आनाकानी करते थे, सोवियत संघ ने खुलकर गले लगाया। MiG-21, MiG-27, MiG-29, T-72, T-90 टैंक, SAM मिसाइलें, INS विक्रमादित्य एयरक्राफ्ट कैरियर – ये सब उस दौर की देन हैं। पहले भारत सिर्फ़ खरीदार था, फिर धीरे-धीरे सह-उत्पादक बना। 
आज सुखोई Su-30MKI भारत में HAL नासिक में बनते हैं। ब्रह्मोस सुपरसॉनिक क्रूज़ मिसाइल दुनिया की सबसे तेज़ और सबसे सटीक मिसाइल है – इसका जन्म ही भारत-रूस की संयुक्त कंपनी में हुआ। नाम भी दोनों नदियों से मिलकर बना – ब्रह्मपुत्र + मॉस्कवा (मॉस्को)। यह सिर्फ़ मिसाइल नहीं, दोस्ती का जीता-जागता प्रतीक है। 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में जब दुश्मन के ठिकानों को सैकड़ों किलोमीटर अंदर जाकर सटीक निशाने पर तबाह करना था, तब ब्रह्मोस ने कमाल कर दिखाया।

3. ऑपरेशन सिंदूर में S-400 ने बनाई अभेद्य ढाल
2025 का ऑपरेशन सिंदूर जब शुरू हुआ तो पाकिस्तान ने सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें एक साथ छोड़ीं। उस वक्त पश्चिमी देशों के एयर डिफ़ेंस सिस्टम या तो थे ही नहीं या फिर इतने बड़े हमले को झेल नहीं पाते। लेकिन रूस से आए S-400 स्क्वॉड्रन ने कमाल कर दिया। 400 किलोमीटर तक की रेंज, एक साथ 80 टारगेट ट्रैक करने और ३६ को मार गिराने की क्षमता – यह सिस्टम सचमुच गेम-चेंजर साबित हुआ। 
न सिर्फ़ मिसाइलें रोकीं बल्कि दुश्मन के लड़ाकू विमानों को भारतीय सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर ही रखा। रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर सिस्टम ने मिलकर ऐसा जाल बिछाया कि कोई भी हवाई खतरा भारतीय ज़मीन तक नहीं पहुँच सका। यही वजह है कि अब भारत और S-400 स्क्वॉड्रन खरीदने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। पुतिन की दिसंबर 2025 की भारत यात्रा में इसी पर मुहर लगने की पूरी संभावना है।

4. जब दुनिया ने मुँह फेर लिया, तब भी रूस ने हथियार नहीं रोके
2022 से रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है। पश्चिमी देशों ने उस पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। फिर भी रूस ने भारत को S-400 की डिलीवरी समय पर पूरी की। स्पेयर पार्ट्स, मिसाइलें, रखरखाव – एक भी चीज़ में कमी नहीं आने दी। यही भरोसा है जो दशकों से बना हुआ है। 
जब 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका और यूरोप ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे, तब भी रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इनकार नहीं किया। अंतरिक्ष कार्यक्रम हो या परमाणु पनडुब्बी INS अरिहंत – हर कदम पर रूस खड़ा रहा। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर से लेकर आतंकवाद तक, हर मौके पर रूस ने वीटो की तलवार लटकाकर भारत के दुश्मनों को चेतावनी दी है।

5. अब खरीदार नहीं, बराबर का पार्टनर है भारत
नीति आयोग के सदस्य और ब्रह्मोस के जनक कहे जाने वाले डॉ. वी.के. सारस्वत ठीक कहते हैं – “पहले हम खरीदार थे, अब हम सह-निर्माता और सह-विकासकर्ता हैं।” अब रूस भारत में ही नई पीढ़ी के हथियार बनाने की फैक्ट्री लगा रहा है। KA-226T हेलिकॉप्टर, AK-203 राइफ़ल, सुखोई Su-57 फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट पर बात चल रही है। पुतिन की आने वाली यात्रा में Su-57 को भारत में ही बनाने की घोषणा हो सकती है। 
यह दोस्ती अब सिर्फ़ हथियारों तक सीमित नहीं रही। न्यूक्लियर रिएक्टर, अंतरिक्ष सहयोग, आर्कटिक में तेल-गैस प्रोजेक्ट, चाबहार पोर्ट से नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर तक – हर क्षेत्र में दोनों देश कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं।

6. आखिरी बात: यह दोस्ती वक़्त की कसौटी पर खरी उतरी है
दुनिया बदल गई। सोवियत संघ टूट गया, शीत युद्ध खत्म हुआ, अमेरिका-भारत रिश्ते नई ऊँचाई पर पहुँचे, लेकिन भारत-रूस की दोस्ती आज भी वैसी की वैसी है। जब 1971 में अमेरिका धमकाने आया तो रूस ने ढाल बनकर खड़ा हुआ। जब 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में दुश्मन ने चारों तरफ़ से घेरा तो रूस के हथियारों ने भारत को विजेता बनाया। 
यह दोस्ती न कभी पैसे की मोहताज़ रही, न दबाव में झुकी। यह वह दोस्ती है जो मुसीबत में साथ खड़ी होती है, सुख में पीठ थपथपाती है और ज़रूरत पड़ने पर गोली भी चलाती है। मॉस्को से दिल्ली तक, ब्रह्मपुत्र से मॉस्कवा तक – यह रिश्ता सिर्फ़ रणनीतिक नहीं, दिल से दिल तक का है। 

जब तक भारत और रूस एक-दूसरे के साथ हैं, तब तक कोई ताकत हिंदुस्तान की तरफ़ आँख उठाकर नहीं देख सकता। यही वजह है कि दुनिया इसे “टाइम-टेस्टेड” और “सबसे भरोसेमंद” दोस्ती कहती है।