By: Ravindra Sikarwar
भोपाल के जहांगीराबाद इलाके में रहने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता शिवकुमार वर्मा की जिंदगी हमेशा किताबों, अदालती दलीलों और न्याय की लड़ाई के इर्द-गिर्द घूमती थी। साठ पार कर चुके शिवकुमार को लोग सम्मान से “वर्मा सर” कहकर बुलाते थे। उनकी सादगी और ईमानदारी की मिसाल दी जाती थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों से वे चुप-चुप रहने लगे थे। परिवार को लगा शायद कोई पुराना केस उन्हें परेशान कर रहा है। किसी को नहीं पता था कि एक अनजान फोन कॉल उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।
सब कुछ शुरू हुआ एक दोपहर जब शिवकुमार के मोबाइल पर एक कॉल आया। दूसरी तरफ से आवाज आई, “शिवकुमार वर्मा जी? आप बोल रहे हैं? मैं दिल्ली से क्राइम ब्रांच से बोल रहा हूँ।” कॉल करने वाला खुद को डीसीपी रैंक का अधिकारी बता रहा था। उसने कहा कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुए आतंकी हमले की फंडिंग में शिवकुमार वर्मा का नाम आया है। उनके बैंक खातों से आतंकियों तक पैसा गया है। अब उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” किया जा रहा है। घर से बाहर नहीं निकलना है, किसी से बात नहीं करनी है, वरना पूरा परिवार जेल जाएगा। फिर व्हाट्सएप पर फर्जी वारंट, फर्जी न्यूज़ क्लिपिंग और फोटोशॉप की हुईं तस्वीरें भेजी गईं। शिवकुमार ने जब अपनी सफाई देने की कोशिश की तो दूसरी तरफ से धमकी मिली – “अगर मीडिया में नाम आ गया तो पूरा भोपाल आपको देशद्रोही कहेगा। आप वकील हैं, इज्जत की कीमत समझते हैं।” अगले तीन दिनों तक लगातार कॉल्स आती रहीं। कभी सीबीआई, कभी एनआईए, कभी कोर्ट का अधिकारी बनकर। हर बार एक ही बात – पैसा ट्रांसफर करो, केस रफा-दफा हो जाएगा। शिवकुमार ने किसी को कुछ नहीं बताया। वे जानते थे कि अगर बात फैली तो लोग विश्वास करेंगे या नहीं, लेकिन शक की एक लकीर तो जरूर खिंच जाएगी।
उस रात जब परिवार सो रहा था, शिवकुमार ने अपने कमरे में एक कागज पर कुछ लाइनें लिखीं। सुसाइड नोट में सिर्फ इतना था – “पहलगाम आतंकी हमले के आतंकवादियों को फंडिंग करने का मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाया जा रहा है। मैंने जीवनभर देश के लिए और न्याय के लिए काम किया। देशद्रोही कहलाने का कलंक मैं सहन नहीं कर सकता। मेरे परिवार को बचा लें।” इसके बाद उन्होंने फांसी का फंदा लगा लिया। सुबह जब बेटा कमरे में गया तो दरवाज़ा अंदर से बंद था। किवाड़ तोड़कर अंदर देखा तो पिता की लाश लटकी हुई थी और मेज़ पर वही सुसाइड नोट पड़ा था।
जहांगीराबाद पुलिस ने तुरंत मामला दर्ज किया। यह मध्य प्रदेश में डिजिटल अरेस्ट की धमकी से हुई पहली मौत थी। पुलिस की शुरुआती जांच में पता चला कि कॉल्स पाकिस्तान और दुबई के नंबरों से आ रहे थे। ठग स्काइप और व्हाट्सएप कॉलिंग का इस्तेमाल कर रहे थे। फर्जी वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी पहने लोग दिखते थे। बैंक डिटेल्स मांगने की कोशिश की गई थी, लेकिन शिवकुमार ने एक रुपया भी नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ अपनी इज्जत बचाने के लिए जान दे दी। पुलिस अब साइबर सेल के साथ मिलकर उन नंबरों को ट्रेस कर रही है। परिवार वाले टूट चुके हैं। बेटा बार-बार यही कहता है, “पापा ने हमें कुछ बताया तक नहीं। काश एक बार कह देते, हम पुलिस के पास ले जाते।”
शिवकुमार वर्मा की मौत ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। पुलिस अब हर थाने में जागरूकता कैंपेन चला रही है कि कोई भी सरकारी अधिकारी फोन पर पैसे नहीं मांगता, ना ही डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई चीज होती है। लेकिन सवाल यह है कि जब तक अगला शिकार ना हो जाए, हम कब तक इंतज़ार करते रहेंगे? एक ईमानदार वकील की मौत ने बता दिया कि साइबर ठग अब सिर्फ पैसे नहीं, जान भी ले रहे हैं। शिवकुमार वर्मा शायद वापस ना आएं, लेकिन उनकी कहानी हर उस व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए जो फोन की घंटी बजते ही डर जाता है।
