by-Ravindra Sikarwar
अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए जा रहे नए टैरिफों (आयात शुल्क) के कारण वैश्विक व्यापार में उथल-पुथल मची हुई है। इस स्थिति का सीधा असर भारत पर भी पड़ रहा है, क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। लेकिन भारतीय उद्यमी और निर्यातक अब इस चुनौती को अवसर में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वे पारंपरिक बाजारों से हटकर दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे नए क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं।
टैरिफ युद्ध का भारतीय निर्यात पर प्रभाव:
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में लागू की जा रही टैरिफ नीतियां मुख्य रूप से चीन, मैक्सिको और कनाडा पर केंद्रित हैं, लेकिन इनका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर भी दिख रहा है। स्टील, एल्यूमिनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भारतीय सामान अब अमेरिकी बाजार में पहले की तुलना में महंगा पड़ सकता है। इससे निर्यात में कमी आने की आशंका है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट लंबे समय तक नहीं रहेगा, क्योंकि भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमतें वैश्विक स्तर पर सराही जाती हैं।
नए बाजारों की खोज:
भारतीय निर्यातक अब वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों पर ध्यान दे रहे हैं। इन देशों में तेजी से बढ़ती मध्यम वर्ग की आबादी और औद्योगिक विकास नए अवसर पैदा कर रहा है। इसी तरह, अफ्रीकी देशों जैसे नाइजीरिया, केन्या और दक्षिण अफ्रीका में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भारतीय मशीनरी और दवाइयों की मांग बढ़ रही है।
यूरोप में ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बात चल रही है, जो भारतीय आईटी, फार्मा और ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए बड़ा बाजार खोल सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर ताजा अपडेट:
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने हाल ही में घोषणा की है कि भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (Bilateral Trade Agreement) अब अंतिम चरण में है। इस समझौते के तहत दोनों देश टैरिफ में कमी, निवेश संरक्षण और बौद्धिक संपदा अधिकारों पर सहमति बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप वर्ष 2026 की शुरुआत में भारत की आधिकारिक यात्रा पर आ सकते हैं। इस दौरान नई दिल्ली या अहमदाबाद में एक बड़े व्यापारिक शिखर सम्मेलन का आयोजन होने की संभावना है, जिसमें दोनों देशों के उद्योगपति और नीति निर्माता हिस्सा लेंगे। यह दौरा न केवल व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि रक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग को भी नई गति देगा।
सरकार की भूमिका और नीतिगत समर्थन:
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यातकों के लिए ‘मार्केट एक्सेस इनिशिएटिव’ (MAI) योजना को और मजबूत किया है। इसके तहत नए बाजारों में व्यापार मेलों, खरीदार-विक्रेता मीटिंग्स और डिजिटल मार्केटिंग के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है। साथ ही, ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (PLI) स्कीम के जरिए घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति मजबूत हो।
अमेरिकी टैरिफ नीतियां भले ही अल्पकालिक चुनौती पेश कर रही हों, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीलापन और उद्यमियों की दूरदर्शिता इसे एक नए युग की शुरुआत बना सकती है। नए बाजारों की खोज और मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के साथ भारत न केवल अपने निर्यात को बचाए रखेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को और बढ़ाने में सफल होगा।
