by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली/संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की एक बहस में भारत ने पाकिस्तान पर कड़ा हमला बोला, इसे “अपने ही नागरिकों पर बम गिराने वाला” और “व्यवस्थित नरसंहार” करने वाला देश करार दिया। यह बयान भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरिश ने मंगलवार को “महिलाएँ, शांति और सुरक्षा” विषय पर खुली चर्चा के दौरान दिया। पाकिस्तान के कश्मीर पर “भ्रमपूर्ण और निरर्थक” हमलों का जवाब देते हुए हरिश ने कहा कि पाकिस्तान जैसे देश केवल “गुमराह करने वाली चालाकियों और अतिशयोक्ति” से दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है। उन्होंने 1971 के ऑपरेशन सर्चलाइट का जिक्र करते हुए पाकिस्तानी सेना द्वारा 4 लाख महिलाओं पर “नरसंहारकारी सामूहिक बलात्कार” की मंजूरी देने का आरोप लगाया। यह बयान न केवल द्विपक्षीय तनाव को उजागर करता है, बल्कि पाकिस्तान की आंतरिक मानवाधिकार उल्लंघनों पर वैश्विक नजर डालता है।
बहस का संदर्भ: पाकिस्तान के कश्मीर वाले बयान पर भारत का जवाब
यह घटना यूएनएससी की नियमित बहस का हिस्सा थी, जहाँ पाकिस्तान के प्रतिनिधि साइमा सलीम ने कश्मीर मुद्दे पर भारत की आलोचना की। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को “भारतीय क्षेत्र नहीं” बताते हुए वहाँ की महिलाओं की स्थिति पर सवाल उठाए। हरिश ने इसका सीधा जवाब देते हुए कहा, “हर साल हमें पाकिस्तान के भ्रमपूर्ण तिरस्कार सुनने का दुर्भाग्य होता है, खासकर जम्मू-कश्मीर के बारे में, जो भारत का अभिन्न हिस्सा है। हमारी महिलाओं, शांति और सुरक्षा एजेंडे पर अग्रणी भूमिका बेदाग और अप्रभावित है।”
उन्होंने आगे जोर देकर कहा, “अपने ही लोगों पर बम गिराने वाला, व्यवस्थित नरसंहार करने वाला देश केवल दुनिया को गुमराह करने और अतिशयोक्ति से भटकाने की कोशिश कर सकता है।” हरिश ने पाकिस्तान को “प्रचार का सहारा लेने वाला” बताया, जो अपनी गलतियों से ध्यान हटाने के लिए भारत पर उंगली उठाता है। यह बयान न केवल कूटनीतिक स्तर पर तीखा था, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों से समर्थित भी, जो पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: 1971 का ऑपरेशन सर्चलाइट और बांग्लादेश नरसंहार
हरिश ने अपने भाषण में पाकिस्तान के अतीत को कुरेदते हुए 1971 के ऑपरेशन सर्चलाइट का उल्लेख किया, जो पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में शुरू किया गया था। इस सैन्य अभियान का उद्देश्य बंगाली राष्ट्रवादियों को कुचलना था, लेकिन यह एक क्रूर दमन अभियान बन गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने बंगाली बुद्धिजीवियों, छात्रों और नागरिकों पर हमले किए, जिसमें लाखों लोग मारे गए।
विशेष रूप से, हरिश ने “नरसंहारकारी सामूहिक बलात्कार” का जिक्र किया, जिसमें पाकिस्तानी सेना ने अनुमति देकर 4 लाख महिलाओं का यौन शोषण किया। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, इस अभियान में 3 लाख से 30 लाख बंगालियों की हत्या हुई, और 1 करोड़ से अधिक शरणार्थी भारत भाग आए। यह घटना न केवल बांग्लादेश की स्वतंत्रता का कारण बनी, बल्कि पाकिस्तान की मानवाधिकार छवि को हमेशा के लिए धूमिल कर दिया। हरिश ने कहा, “दुनिया पाकिस्तान के प्रचार को भेद सकती है।” यह बयान पाकिस्तान को उसके अतीत के आईने में देखने की चेतावनी था।
हालिया उदाहरण: खैबर पख्तूनख्वा में हवाई हमले
हरिश के “अपने ही लोगों पर बम गिराने” वाले बयान का संदर्भ पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता से जुड़ा है। पिछले महीने, पाकिस्तानी वायुसेना ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के एक गाँव पर रात्रिकालीन हवाई हमला किया, जिसमें 30 से अधिक निर्दोष नागरिक मारे गए। यह हमला तालिबान समर्थकों के खिलाफ था, लेकिन इससे स्थानीय पश्तून आबादी पर भारी नुकसान हुआ। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे “राज्य प्रायोजित आतंकवाद” करार दिया, क्योंकि इससे नागरिकों की जानें गईं।
पाकिस्तान लंबे समय से बलूचिस्तान और सिंध जैसे प्रांतों में विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता रहा है, जिसमें हवाई बमबारी और तोपखाने का इस्तेमाल होता है। इन अभियानों में हजारों नागरिक मारे गए हैं, और संयुक्त राष्ट्र ने इन्हें “मानवाधिकार उल्लंघन” बताया है। हरिश का बयान इन घटनाओं को रेखांकित करता है, जो पाकिस्तान की आंतरिक नीतियों की विफलता को उजागर करता है।
भारत का रुख: महिलाओं की सुरक्षा पर अग्रणी भूमिका
भारतीय प्रतिनिधि ने बहस के मूल विषय – महिलाएँ, शांति और सुरक्षा – पर भारत की उपलब्धियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के इस एजेंडे पर “अग्रणी” भूमिका निभाई है, जिसमें महिलाओं को शांति प्रक्रियाओं में शामिल करने के लिए नीतियाँ बनाई गई हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई है, और राष्ट्रीय स्तर पर लिंग समानता को बढ़ावा दिया है। हरिश ने पाकिस्तान के आरोपों को “निराधार” बताते हुए कहा कि भारत का रिकॉर्ड “बेदाग” है।
यह बयान भारत की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जो पाकिस्तान को उसके घरेलू मुद्दों पर घेरने का प्रयास करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जिस्सी ने बाद में कहा, “भारत हमेशा तथ्यों पर आधारित जवाब देता है, जबकि पाकिस्तान प्रचार करता है।”
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और वैश्विक संदर्भ:
पाकिस्तान ने अभी तक इस बयान पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन अतीत में ऐसे आरोपों को “भारतीय प्रचार” बताकर खारिज किया जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी प्रतिनिधि साइमा सलीम ने कश्मीर पर बोलते हुए भारत की आलोचना की थी, लेकिन भारत के जवाब ने बहस को उलट दिया। यह घटना भारत-पाकिस्तान संबंधों के तनावपूर्ण इतिहास को दर्शाती है, जहाँ कश्मीर मुद्दा हमेशा केंद्र में रहता है।
वैश्विक स्तर पर, यह बयान संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार फोरम में भारत की मजबूत स्थिति को मजबूत करता है। सितंबर में ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान पर अप्रत्यक्ष निशाना साधा था, और जिनेवा में काउंसलर क्षितिज त्यागी ने पाकिस्तान को “आर्थिक रूप से संकटग्रस्त” बताते हुए उसके मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाए थे।
निष्कर्ष: कूटनीतिक युद्ध में तथ्यों की जीत
भारत का यह बयान न केवल पाकिस्तान के कश्मीर-केंद्रित प्रचार को तोड़ता है, बल्कि उसके आंतरिक अत्याचारों को वैश्विक मंच पर उजागर करता है। 1971 का नरसंहार और हालिया हवाई हमलों के उदाहरण पाकिस्तान की दोहरी नैतिकता को बेनकाब करते हैं। हरिश का भाषण महिलाओं की सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दे पर भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है, जबकि पाकिस्तान को उसके अतीत और वर्तमान से रूबरू कराता है। यह कूटनीतिक झड़प भारत-पाकिस्तान संबंधों में नई बहस छेड़ सकती है, लेकिन तथ्यों पर आधारित होने से इसकी विश्वसनीयता बढ़ जाती है। उम्मीद है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच मानवाधिकारों की रक्षा के लिए और सक्रिय होंगे।
